अष्टांग योग और जैन धर्म: भाग-2

पहले “अष्टांग योग और जैन धर्म : भाग-1 पढ़ें .

(1). आसन
पतंजलि ने स्थिर तथा सुखपूर्वक बैठने की क्रिया को आसन कहा है।

जैन धर्म में भी सामायिक  और प्रतिक्रमण एक ही स्थान पर बैठकर कहा गया है. प्रतिक्रमण में अन्य योग-क्रियायें  (आसन इत्यादि)   भी आ ही जाते हैं. जैसे कई बार बायां पैर ऊपर करना (चैत्यवंदन करते समय), कभी दायाँ पैर ऊपर करना (वन्दित्तु सूत्र बोलते समय), कभी खड़े होना (आयरिय उवझ्झाय), इत्यादि.

(2). प्राणायाम
योग की यथेष्ट भूमिका के लिए नाड़ी शोधन और उनके जागरण के लिए किया जाने वाला श्वास और प्रश्वास का नियमन प्राणायाम है। प्राणायाम मन की चंचलता को रोकने के लिए बहुत उपयोगी है.
जैन धर्म में “काउसग्ग” प्राणायाम पर ही आधारित है जो अनादि काल से चला आ रहा है.

 

(3). प्रत्याहार
इंद्रियों को विषयों से हटाने का नाम ही प्रत्याहार है यानि अनावश्यक भौतिक सुखों का त्याग करना ।

(4). धारणा
चित्त को एक स्थान विशेष पर केंद्रित करना ही धारणा है।
संवत्सरी प्रतिक्रमण के समय 40  लोगस्स का काउसग्ग करना.
बार बार प्रतिज्ञा का स्मरण करना – ये प्रतिक्रमण की विशेषता है.

 

(5). ध्यान
जब ध्येय वस्तु का (आत्मा का ) चिंतन करते हुए चित्त उसी में स्थिर  हो जाता है तो उसे ध्यान कहते हैं। पूर्ण ध्यान की स्थिति में किसी अन्य वस्तु का ज्ञान अथवा उसकी स्मृति चित्त में नहीं होती।
जब व्यक्ति “काउसग्ग” में लीन हो जाता है, तो वो ध्यान की उच्च अवस्था होती है.

(6).समाधि
यह चित्त की अवस्था है जिसमें चित्त ध्येय वस्तु के चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाता है। योग दर्शन समाधि के द्वारा ही मोक्ष प्राप्ति को संभव मानता है।

“जीव” अपनी “आत्मा” में ही लीन हो जाए, यही मनुष्य जीवन की सार्थकता है.

 

किसी भी तरह मेडिकल ट्रीटमेंट करते हुवे अपने ऐसे “शरीर” को बचाना, जिसका अब कोई और उपयोग नहीं रह गया हो – घोर मिथ्यात्व है.

भले ही सगे -सम्बन्धी अपना “उचित” कार्य करे, पर मृत्यु के समय यदि व्यक्ति स्वयं (आत्मा) में लीन है, तो ही वो अपना  जीवन सार्थक करता है.