अभवी जीव

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यदि किसी के मन में इस विचार से चिंता हो की मैं कभी मोक्ष जाऊँगा या नहीं,
तो समझ लेना कि वो मोक्ष कभी ना कभी अवश्य जाएगा और वो भी जल्दी ही.

इसे ऐसा ही समझें जैसे कोई बच्चा अपनी माँ को पूछे की “मैं जाग रहा हूँ या सो रहा हूँ?”
उत्तर स्पष्ट है कि वो जाग ही रहा है.

“अभव्य” जीव के अंतर मन में “निष्ठुरता” होती है. “दया” नाम की कोई बात नहीं होती. ऐसे जीव “जिन धर्म” का पालन करते हुए दिखते हैं, परन्तु वास्तव में “अधर्मी” होते हैं.

 

अंगारमर्दक आचार्य:
500 शिष्यों के गुरु अंगारमर्दक आचार्य!
जबरदस्त व्याख्यानकार और ऊँचा संयम पालने वाले!
“मोक्ष सुख” का “वर्णन” भी ऐसा करे कि कईओं को “सम्यक्त्त्व” प्राप्त हो जाए!
500 शिष्य ऐसे ही थोड़ी बनते हैं!
पर खुद मन में “खुश” हो कि वाह! लोग मेरी कैसी भक्ति करते हैं और कैसा मेरा मान सम्मान है,मोक्ष को तो किसने देखा है!
मतलब अंदर से “चारित्रहीन” थे.

एक बार एक नगर में सवेरे प्रवेश करने वाले थे परन्तु उसी से पहले वाली रात्रि को वहीँ विराजमान एक अन्य आचार्य को स्वप्न आया :

 

500 “हाथिओं” के बीच में एक “ऊंट!”
स्वप्न फल के आधार पर उन्होंने जाना कि आने वाले आचार्य वास्तव में अभवी जीव हैं.
उनके शिष्यों को बुलाकर कहा :
तुंम्हारे “गुरु” के “ज्ञान” को आज प्रकट करूँगा. रात्रि को जब वो मात्रा (पेशाब) करने निकलें तो कोई भी उठे नहीं और उन्हें अकेले ही जाने दें और शाम को ही उस रास्ते में कुछ कोयले के छोटे छोटे टुकड़े डाल देना. तुम उनकी “चेष्टाओं “को गुप्त रूप से देखना.
रात को जब आचार्य “मात्रा” करने के लिए उठे तो रास्ते में कोयले के टुकड़े पैर के नीचे दबने से “कीचुड कीचुड” की आवाज आई.

आचार्य ने कहा : अरे! “अरिहंत” के जीवड़े यहाँ पर भी “पड़े” हैं! लो मरो! मेरे पाँव के नीचे मरो!

 

“शिष्य” तो “हतप्रभ” (आश्चर्यचकित) हो गए कि हमारे गुरु “ऐसे” हैं!
सवेरे ही उस गुरु का त्याग कर दिया!

मतलब “नवकार” मंत्र और अन्य सूत्रों का “स्मरण” करने और भगवान महावीर के शासन में दीक्षा लेने के कारण जो “मन” में था वो तो मिला पर वो नहीं मिला जो “मिलना” चाहिए था!

Check Point:
क्या हम भी धर्म आराधना कुछ ऐसा ही पाने के लिए तो नहीं कर रहे हैं?

फोटो: तारंगा तीर्थाधिपति श्री अजितनाथ स्वामी