मंत्र दीक्षा की आवश्यकता-1

“मंत्र” और उसकी “दीक्षा”

मंत्र पढ़ने में समय नहीं लगता
और
दीक्षा देने में भी समय नहीं लगता.

परन्तु दोनों की पूर्व भूमिका में बहुत समय लगता है.

 

जैसे आजकल बच्चों के प्राइमरी स्कूल के एडमिशन में भी बहुत जोर लगाना होता है.
स्कूल वाले नाटक ऐसे करते हैं मानो वह बच्चे को स्कूल से ही “डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, इत्यादि बना देंगे.

परिवार वालों द्वारा लड़का/लड़की पसंद करने के बाद भी “सैकड़ों” तैयारियां करनी पड़ती है.
समाज में सबसे “ख़ुशी” के मौके पर लड़का और लड़की वाले दोनों ही “शुरू” में “मेराथन दौड़” लगाते हैं और अंत में “पस्त” हो जाते हैं. 🙂

 

शादी की ख़ुशी के मौके पर ज्यादातर “परिवारवाले” ही साथ नहीं देते, ये कटु सत्य है.
फिर भी रहते वो “हमारे” ही हैं, भले ही हमें “मारें.” 🙂
इतना सब कुछ होने पर भी हम “घर में शादी” के मौके को ही सबसे बढ़िया मानते  हैं.

बस ऐसा ही “मंत्र-सिद्धि” को समझ लें.
इसमें “सौ” अड़चने आती हैं,
फिर भी हिम्मत नहीं हारी जाती.
तभी “सिद्धि” प्राप्त होती है.

 

यद्यपि कुछ लोग “बिना दीक्षा” लिए भी सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं, पर ऐसे लोग बहुत कम हैं जो स्वयं “दीक्षा” ले पाते हों या बिना गुरु के मंत्र सिद्धि  प्राप्त कर पाते हों.

जो व्यक्ति पूर्व जन्म में “साधना” से च्युत हो गए हों या उनकी उम्र कम होने के कारण “साधना” अधूरी रह गयी हो, वो ही अपने अगले जन्म में “स्वयंदीक्षित” हो पाते हैं, हालांकि ये “नियम” नहीं है.
इन्हें पूर्व जन्म का “योग-भ्रष्ट” कहा जाता है.
अन्यथा “बचपन” में ही “ज्ञान” प्राप्त करना संभव नहीं होता, और वो भी गुरु के बिना! – लगभग “असंभव” जैसा है.

 

हज़ारों मन्त्रों की पुस्तकें सब जगह उपलब्ध हैं. कई जन ये जानना चाहते हैं कि “जैन मन्त्रों”  की पुस्तकें कहाँ मिलेंगी. जैन मन्त्रों की पुस्तकें “उपाश्रय और मंदिरों” में ऐसी जगह मिलेगी जहाँ कोई जाना नहीं चाहता और ऐसी स्थिति में मिलेगी,  जिन्हें कोई “छूना” भी पसंद नहीं करता.

ज्यादातर लोग “धर्म” कि किताब हाथ में इसलिए भी नहीं लेना चाहते कि “हाथ” में लेने से “पढ़नी पड़ेगी! 🙂

(“धर्म” की पुस्तक को पढ़ने वाला कोई विरला ही होता है).