अष्टांग योग के चमत्कार

बाबा रामदेव ने सामान्य जनता को अष्टांग योग के चार पहलु
बहुत ही अच्छी तरह बताये हैं.
१. यम
२. नियम
३. आसन
४. प्राणायाम

अन्य चार पहलु जो कि बहुत उच्च कोटि के हैं, वो सामान्य जनता के लिए लगभग स्वप्न जैसा है क्योंकि मेजोरिटी का “ध्यान” अपने “शरीर” तक ही है:

५. प्रत्याहार
६. धारणा
७. ध्यान
८. समाधि

 

योग के पहले चार  पहलु “सामान्य जनता के सामने प्रकट रूप” से रखकर श्री रामदेवजी वो काम कर पाये हैं जो पिछले 500 वर्षों में किसी ने नहीं किया.

उन्होंने “योग” को खुद प्रकट नहीं किया है. “योग” तो अनादिकाल से भारतीय संस्कृति में है. हम ही उसे भुला बैठे थे.

जैन धर्म में भी लगभग सभी “श्रावकों” को “कायोत्सर्ग” करने की विधि नहीं आती. ज्यादातर साधुओं और साध्वियों को भी नहीं आती. इसीलिए “शरीर” से ममत्त्व ज्यादा है. निर्भयता नहीं है. अधिक  बिमारियां  भी इसी कारण से आती है.

जिसे योग करना आता है, वो स्वस्थ रहता है, इस बात पर अब किसी को शंका नहीं है. परन्तु अभी भी युवा वर्ग “योग” पर विश्वास कम रखता है और “मेडिक्लेम” पर ज्यादा.

 

पहले चार योगों का सार इस प्रकार है:

(1).यम:
मन, वचन और काय के  संयम के लिए अहिंसा, सत्य, अस्तेय चोरी न करना, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह आदि पाँच आचार विहित हैं। इनका पालन न करने से व्यक्ति का जीवन और समाज दोनों ही दुष्प्रभावित होते हैं।
हर जैनी इन पाँचों में से एक का भी पालन करे, तो जीवन में कभी दुखी नहीं हो सकता. जो “सत्य” बोलता है, उसे “बिमारी” दूर से ही “नमस्कार” करती है.

(2).नियम:
मनुष्य को कर्तव्य परायण बनाने तथा जीवन को सुव्यवस्थित करते हेतु नियमों का विधान किया गया है। इनके अंतर्गत शौच (शुद्धि), संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान (शरण) का समावेश है। शौच में शरीर और मन दोनों ही प्रकार की शुद्धि शामिल है.

(3).आसन:
स्थिरतापूर्वक सुख से बैठने की क्रिया को आसन कहा है।

 

(4).प्राणायाम:
योग की यथेष्ट भूमिका के लिए नाड़ी शोधन और उनके जागरण के लिए किया जाने वाला श्वास और प्रश्वास का नियमन प्राणायाम है। प्राणायाम मन की चंचलता  पर विजय प्राप्त करने के लिए बहुत सहायक है।

शुरुआत में श्वास “देखने” की क्रिया से लेकर उसे कुम्भक (श्वास को भीतर रोके रहना), रेचक (श्वास को बाहर ही  रोके रहना) पर विशेष ध्यान दिया जाता है.

जिसे 1 मिनट भी “श्वास” रोकना (कुम्भक) आ गया, वो सिद्धि प्राप्त करने का “अधिकारी” हो जाता है और सिद्धि प्राप्त हो भी जाती है.
श्वास रोकने के साथ ही “विचार” और “इच्छाएं” भी स्वत: ही मिट जाती हैं.