“नमुत्थुणं” सूत्र का प्रभाव

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की एक अन्य पोस्ट में लिखा था की गणधरों और श्री महावीर भगवान की पाट परंपरा का हमारे पर कितना उपकार है कि उन्होंने हमें नमुत्थुणं जैसा सूत्र दिया.

जो सूत्र स्वयं इन्द्र भगवान के सामने बोलता है, वो हमें “मुफ्त” में ही दे दिया गया है.

नमुत्थुणं  सूत्र शाश्वत (permanent) है क्योंकि जब भी तीर्थंकरों का जन्म होता है, तब सौधर्मेन्द्र  इसी सूत्र से भगवान की स्तुति करते हैं.

पूरा सूत्र जानने के लिए ये लिंक देखें:

विशेष:
कई “भजनों” में स्वयं को “(भव-भव की) मार खाए हुवे आदमी” की तरह “दीन हीन और “पापी” कहने की बात कही गयी है.

Jainmantras.com  इससे “सहमत” नहीं है. जिसके मन के जैसे भाव होते हैं, वैसे ही “शब्द” उसके मुंह से निकलते हैं.

तीर्थंकरों की “शरण” में आने के बाद कोई “दीन हीन” कैसे हो सकता है और विशेषतः  जब हर जैनी को “नमुत्थुणं” जैसा सूत्र बोलने का “अधिकार” दिया गया है.

गणधरों द्वारा रचित किसी भी सूत्र में श्रावक को दीन-हीन नहीं कहा गया है.
सामायिक  में भी “सामायिक” “करने में होने वाले “३२ दूषण बताये गए है, ना कि “श्रावक” द्वारा किये जाने वाले ३२ दूषण की बात कही गयी है.
18 पाप स्थानक में भी कहीं पर भी “श्रावक द्वारा किये जाने वाले 18 पापों की बात नहीं कही गयी.” क्योंकि सारी प्रोसेस  “शुद्धिकरण” की ही तो चल रही है.

बार बार रोना कि मैं दीन-हीन हूँ, भव-भव से भटका हूँ, पापी हूँ….इत्यादि “मनुष्य” जन्म की महत्ता ना प्रकट करके “रोने-धोने” की बात करते हैं.
“संसार” में ही रोने के बहुत से “मौके” हैं.
“भगवान” के आगे तो आते ही मन “प्रसन्न” हो जाता है….
“अच्छी” जगह आकर भी वो संसार का “अपना दुखड़ा” भगवान के आगे रोयेगा?

जैन धर्म का एक एक सूत्र “अनमोल” है.
ना सिर्फ समस्याओं से छुटकारा दिलाते हैं बल्कि सभी इच्छित प्राप्त अपने आप होते हैं.
जैनिओं  को “मांगने” की जरूरत नहीं पड़ती.
बस “भक्ति” का “बल” चाहिए.

जितना बल एक व्यक्ति में “पाप” करने का होता है,“भक्ति” करने का “बल” हर व्यक्ति में कम से कम उससे 100 गुना होता है.

पापी को तो पाप करने के बाद “ज्यादा भोजन, भोग और निद्रा “चाहिए (आज के संसार के “परम सुख” इन्हीं में माने जाते हैं – जिसकी शुरुआत (पाप की भी) “घूमने-फिरने” से होती है.)

जबकि  “धर्मी” तो “उपवास” में भूखा  रहकर भी चित्त की बड़ी प्रसन्नता से भगवान के आगे  “नमुत्थुणं” जैसी स्तुति करता है और अपने आप को “इन्द्र” की श्रेणी में रख लेता है.

(“धर्म” करने का फल “देवलोक” और उससे भी कहीं अधिक  “मुक्ति” ही तो है).