68 की महत्ता

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नवकार महामंत्र 68 अक्षर का होता है.
नवकार में “14 बार” “ण” अक्षर आता है.
नवकार 14 पूर्व का सार है.

चरम तीर्थंकर ‘महावीर स्वामी” को 14 बार मनुष्य भव प्राप्त हुआ.

(हमें भी तो अभी मनुष्य जन्म “प्राप्त” ही है, ये तो हमारी “मर्जी”  है कि हम “रत्न” सरीखे जन्म को “मौज-मजा” और मस्ती से बिताना चाहते हैं-क्योंकि हम बुद्धिशाली ये मानते हैं कि आगे का जन्म किसने देखा है – वर्तमान में भी तो हम “भविष्य” के लिए “बचाते” ही कहाँ हैं – “लोन” लेकर भी अपने “शौक” पूरा करने में मानते हैं).

 

एक अन्य पोस्ट में jainmantras.com ने लिखा है  कि नवकार महामंत्र का बीजाक्षर “णं” है.

“68 अंक” की महत्ता बताने से पहले ये बात जान लें की 68 मतलब “अड़सठ” यानि “”साठ” पर “अड़ना!” पर “अड़ना” किस पर? “धर्म” पर! आठ कर्मों को क्षय करना – हो सके तो आठ, नहीं तो साठ  के बाद! “अड़सठ” आने के बाद तो सभी व्यापार छोड़ देना चाहिए.

“हिंदी” में जितने भी “अंक” हैं, उनकी अपनी महत्ता है. जैसे आठ (आठ वर्ष की उम्र के दीक्षा दी जा सकती है), अठारह (अठारह की उम्र वाला व्यक्ति ही “पुख्त” गिना जाता है), इत्यादि.

 

उत्कृष्ट से 68 तीर्थंकर, 68 चक्रवर्ती के “विजय” और 68 राजधानी, 68 अयोध्या नगरी और 68 कोटिशिला  “पुष्करार्ध द्वीप” में होती  हैं.

श्री विमलनाथ भगवन के 68000 साधू थे.
68 ऋषि श्री आनंद विमलसूरीजी के पास “संवेगी साधु” बने.
68 शिष्यों के साथ “जीरावला पार्श्वनाथ” में श्री जयतिलकसुरीजी ने चातुर्मास किया था.

कहने का मतलब ” संख्या ” भी गिनने का काम हो, तो जैन धर्म के आचार्यों ने उसे “बोध” के रूप में लिया है.

 

क्रिकेट के स्कोर को याद करने से अच्छा है, जैन-धर्म के “स्कोर” को याद करें तो “पुण्य” का अर्जन होगा.  क्रिकेट के स्कोर को याद करने से हमें क्या प्राप्त होता है, ये तो वो “बुद्धिशाली” ही जानता है, जो उसे याद करता है. 🙂