नवकार महामंत्र महिमा

जैन धर्म में साधना की शुरुआत नवकार से होती है
और वहीँ पर पूरी होती है.

१४ पूर्वधर भी अपने अंतिम समय में नवकार का ही स्मरण करते हैं.

सामायिक लेते समय भी नवकार बोला जाता है
और
पारते समय भी नवकार बोला जाता है.

नमो अरिहंताणं

नमो सिद्धाणं

नमो आयरियाणं

नमो उवज्झायाणं

नमो लोए सव्व साहूणं

 

नमस्कार महामंत्र में पहले पांच पदों में पांच परमेष्ठी को नमस्कार किया जाता है.
बाकी के चार पद तो नवकार के  फल को बताते  हैं कि
इन किये  गए नमस्कार से सारे पापों का नाश हो जाता हैं.

हर अक्षर १००८ देवों से अधिष्ठित है.

जो अक्षर रिपीट हुए हैं, वो भी अलग गिने जाते हैं.
क्योंकि उन अक्षरों का दूसरे पदों में दूसरे अक्षरों के साथ
सम्बन्ध होने पर उनका अर्थ अलग हो जाता है.

 मात्र एक पद “नमो अरिहंताणं” बोलने से या इस पद का “ध्यान” करने से
५० सागरोपम के पापों का नाश हो जाता हैं.

 

पूरे नवकार का ध्यान करने से या बोलने से

५०० सागरोपम के पापों का नाश हो जाता है.

शंका :

क्या यह संभव है?

इसका उत्तर प्रश्न से देना चाहूंगा:

धंधे में नफा होता है या नुक्सान?
यदि नुक्सान होने का डर हो, तो भी व्यक्ति धंधा क्यों करता है?

क्योंकि पहले धंधे का अनुभव लेता है.
फिर वो पुरुषार्थ पर विश्वास  रखता है.

 

इसका मतलब  पहले साधक को “नवकार” साधना होगा.

और ये तभी संभव हैं जब साधना करते समय
हमारे पास सभी पांच परमेष्ठी की सुन्दर छवि  हो.

हर जैनी को ये सुलभ हैं :

सिद्धचक्र का यन्त्र!

हर पद जो बोला जाय तो उस समय उस पर “ध्यान” रहे :
जैसे नमो अरिहंताणं बोलते समय “सिद्धचक्र” के बीच में
श्री अरिहंत परमात्मा पर दृष्टि  रहे.