माँ सरस्वती-2

Note: पहले माँ सरस्वती-1 वाली पोस्ट पढ़ें

माँ सरस्वती  कमल पर विराजमान है.
मतलब एक फूल पर!
“अहंकाररहित” ज्ञान  की देवी ही इतनी “”सूक्ष्म”(वजनरहित)  हो सकती है.

प्रश्न:
ज्ञानी किसे कहते हैं? :
उत्तर:
जिसमें “अहंकार” ना हो.
जहाँ अहंकार आया,
वहीँ “अज्ञान” अपना “अड्डा” जमाना शुरू कर देता है.

 

ज्ञान की देवी हाथों में माला और पुस्तक लिए है.
दो हाथों में वीणा है.
“शस्त्र” के नाम पर हाथ में है : “शास्त्र !”

सीधी बात है:  जो “सबकी माँ” हो, उसे “शस्त्र” रखने की क्या आवश्यकता है?
उसे तो अपने “सारे बच्चों” को “ज्ञान” देना है.
एक माँ ही तो बच्चे की पहली शिक्षक होती है!

“माँ सरस्वती” ज्ञान की देवी है.

ज्ञान देने के कारण जन्म देने वाली  हर एक की माँ भी देवी है.
तभी तो कहा गया है कि
“मातृ” देवो भव |

 

“माँ” के बारे में और लिखना मतलब आँखों में आंसू लाने जैसा है.

मतलब माता ही “सरस्वती” स्वरुप है!
ये है हमारे भरत क्षेत्र की संस्कृति!
प्रार्थना करो की हमें हमारी संस्कृति की सच्ची धरोहर वापस मिले.

अपनी “अज्ञानता” को स्वीकार करके “माँ” सरस्वती के आगे जो प्रार्थना करता है उसे “ज्ञान” प्राप्त करने के लिए और कोई साधना नहीं करनी पड़ती.

प्रश्न:

वीणा का क्या महत्त्व है?

उत्तर:

“ज्ञान” संगीत है.
संगीत सबको अच्छा लगता है.
वीणा से “स्वर” निकलते हैं.
हिंदी की बारहखड़ी “स्वरों” के आधार पर ही बनी हुई है.
“स्वर” (vowels) के बिना “व्यंजन” अधूरे हैं.

 

प्रश्न:
परन्तु वर्तमान “शिक्षा” में तो कहीं “संगीत” जैसे नहीं लगता?
उत्तर:
वर्तमान “शिक्षा” “ज्ञान” नहीं देती, वो मात्र “इनफार्मेशन” देती है.
“ज्ञान” तो “प्रकट” होता है.

उदाहरण :
“संगीत” की जितनी भी नयी धुन बनती है, वो कहीं “पहले से लिखी हुई है क्या?”
उत्तर : नहीं.

इसका मतलब वो धुन बनाने वाले में ही प्रकट हुई है.
स्पष्टीकरण:
कोई भी चीज “प्रकट” वही होती है जो पहले से होती है. बस अभी लोगों को उसके बारे में मालूम नहीं.

जिस पर माँ सरस्वती की कृपा है, वो ही उसे प्रकट कर पाता  है.