शत्रुंजय (पालीताणा) महिमा-4

पूर्व भूमिका :भाग-1 से 3 पहले पढ़ें.

सुंगंधित इत्र, सुगन्धित फूल, कल कल बहती नदी-झरने, चांदी, सोना, रत्न वगैरह सभी “पृथ्वीलोक” में भी हम रोज देखते ही हैं.

जैन धर्म के अनुसार जिनेश्वर की भक्ति इन सभी श्रेष्ठ वस्तुओं से ही होती है और उस से और भी विशेष पुण्य होता है जो अंतत: “मोक्ष” तक ले जाता है.

इसीलिए जिन मंदिरों को समवसरण जैसा ही बनाया जाता  है. ताकि मंदिर में दर्शन करने वाले को लगे कि हर जैनी को कितने श्रेष्ठ स्थान पर जाने का विशेषाधिकार मुफ्त में मिला हुआ है. यही कारण है कि जिन प्रतिमा और जिन मंदिर बनाने वालों में “होड़” सी लगी रहती है. “पुण्य” का काम हो और “होड़” ना लगे, हो ही नहीं सकता!

 

समवसरण के बीच में “ईशान दिशा” में प्रभु को विश्राम (Rest) लेने के लिए एक “देवछंद” रचा. रत्न-गढ़ में 27 धनुष जितना ऊँचा एक “मणिपीठ” और उसके अंदर एक विशाल “चैत्यवृक्ष” (Special Tree) रचा. इस “चैत्यवृक्ष” के
नीचे “सूर्य” के बिम्ब जैसा तेजस्वी पादपीठयुक्त सोने का सिंहासन बनाया.  उसके ऊपर तीन छत्र लगाये.
समवसरण के पास एक हज़ार धनुष ऊँचा “मोक्ष” की सीढ़ी जैसा सोने का “धर्मध्वज” बनाया. हर गढ़ के द्वार पर देवता हाथ में छड़ी रखे “प्रतिहारी” (Security Guard) के रूप में खड़े रहे.

देवताओं द्वारा रचे  “9 स्वर्ण-कमल” (Lotus made of Gold) पर पाँव रखते हुए श्री महावीर स्वामी ने “समवसरण” में प्रवेश किया.
सभी “मोक्षार्थी” (those interested in getting “moksh)” प्रभु की स्तुति करने लगे. उसी समय सोने के कमल में रहा हुवा” पाप का नाश करने वाला “धर्मचक्र” प्रभु के सामने प्रकट हुआ.

 

 

“धर्मचक्र” के साथ भगवान के इस स्वरुप का ध्यान करने का मंत्र है  :

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं श्री धर्मचक्रिणे अर्हते नमः

(हर मंदिर पर आप ये “कोरनी” (sculpture) अवश्य देखेंगे स्थान के अभाव में कुछ मंदिरों में ये नहीं होता).

तब प्रभु ने  “चैत्यवृक्ष” के पास आकर उसकी प्रदक्षिणा की. (हम भी मंदिर की “भमती” में ३ प्रदक्षिणा देते ही हैं).
फिर पूर्व दिशा की तरफ आकर “नमो तित्थस्स” कहकर प्रभु सिहांसन पर विराजे. तुरंतही व्यन्तरदेवों ने प्रभु के तीन रूप रचकर बाकी की ३ दिशाओं में प्रकट किये. ये भगवान का अतिशय (privilege)  है.