नवकार महामंत्र का विराट स्वरुप-7

पहले नवकार महामंत्र का विराट स्वरुप- 1-6 पढ़ें.

भक्तामर स्तोत्र का “आधार” है – नमुत्थुणं सूत्र!

तीर्थंकरों के जन्म होने पर  “सौधर्मेन्द्र” नमुत्थुणं सूत्र से भगवान की स्तुति करते हैं – “अद्भुत विशेषण” लगा कर!
श्री मानतुंग सूरी भी शुरुआत वहीँ से करते हैं – भक्तामर स्तोत्र में.
मानो उस दृश्य का “आँखों देखा हाल”  (live commentary)  बता रहे हों.

और अरिहंतों को नमस्कार किया जाता है – नमो अरिहंताणं पद से यानि नवकार से!

 

विशेष:
जिन्हें “इंद्र” जैसी समृद्धि पानी हो, उन्हें “नमुत्थुणं-सूत्र” रोज इस प्रकार बोलना चाहिए मानो वो भगवान के जन्म पर स्वयं हाजिर हों.

और भी विशेष बात ये है कि ये व्यवस्था हमें “प्रतिक्रमण” करते समय पहले से ही दी हुई है.

उससे भी विशेष बात ये है कि हमें रोज भगवान का जन्माभिषेक जैसा महोत्सव मानने की व्यवस्था “जिन मंदिर-दर्शन-पूजन” द्वारा दी ही गयी है. हमें “मतान्तर” छोड़ कर इसे शुद्ध मन से स्वीकार कर लेना चाहिए भले ही किसी भी पंथ को क्यों ना मानते हों!

 

 

जिनेश्वर भगवान का जन्म मतलब “रुप” ( शरीर – मनुष्य जन्म ) का धारण – जिनका हम आँखों से दर्शन करते हैं.

देव भी स्वर्ग से नीचे उतर कर जिनके “दर्शन” करते हैं. तो क्या हम उनके बिम्ब के “दर्शन” भी नहीं करेंगे जो हर जगह “सुलभ” है?
सिद्धों का स्वरुप – जिनका इन आँखों से दर्शन नहीं हो सकता – केवली को ही अपने ज्ञान से होता है.
तो हमारे लिए सबसे उपयोगी कौन हुवे – अरिहंत!
नमो अरिहंताणं!

“नमुत्थुणं अरिहंताणं” यानि अरिहंतों को नमस्कार!
“नमो अरिहंताणं” – यानि अरिहंतों को नमस्कार!
मतलब दोनों का एक ही है.

 

“घूमकर” वापस आये नवकार पर!

आगे नवकार महामंत्र का विराट स्वरुप- 8 पढ़ें.

फोटो:केसरियाजी तीर्थ-आदिनाथ भगवान
( इस स्थान पर एक समय जैन जाते नहीं थे (साधनों के अभाव में), इसलिए आज भील जाति के लोग अपने तरीके से पूजा करते हैं)