नवकार महामंत्र का विराट स्वरुप-2

पहले नवकार महामंत्र का विराट स्वरुप-1 पढ़ें.

एक परमाणु में अत्यंत ऊर्जा होती है, पर वो आँखों से दिखाई नहीं देती.
“ऊर्जा” कहाँ से दिखाई देगी जब  “परमाणु” ही दिखाई नहीं देता.
जो वस्तु आँखों से दिखाई नहीं देती, इसका अर्थ ये नहीं  कि उसका “अस्तित्त्व” (existence) ही नहीं है.

एक व्यक्ति आँखे बंद करके बैठा है, इसका अर्थ ये नहीं कि वो कुछ नहीं कर रहा.
वो जबरदस्त प्लानिंग कर रहा हो सकता है.

 

प्रश्न ये उठता है कि इन सबका “नवकार” के “विराट” स्वरुप से क्या सम्बन्ध है?

उत्तर है: Science हरदम एक परिकल्पना ( Hypothesis ) ले कर चलता है और फिर उस पर Research करता है. अब आगे ध्यान से पढ़ें.

एक वैज्ञानिक सैकड़ों बार “फ़ैल” होता है, इसका अर्थ ये नहीं कि “हाइपोथिसिस” एकदम गलत है.
कई बार तो वर्ष निकल जाते हैं, उसे अपनी हाइपोथिसिस को प्रूव करने में.
और जिस दिन उसकी रिसर्च पूरी होती है, यानि जो वो सोचता था, वो सही हो जाता है, उसके प्रमाण मिल जाते हैं, बार बार वही रिजल्ट आता है तो वो “शोध” पूरे संसार में पब्लिश हो जाती है.

 

मुद्दे की बात ये है कि बड़े से बड़ा वैज्ञानिक भी जो सोचता है, क्या एक दिन में ही प्रूव कर सकता है?

यदि नहीं, तो फिर “मंत्र-विज्ञान” से लोग एक दिन में ही “पॉजिटिव रिजल्ट” लेने की  कैसे सोच सकते हैं?

लोग “पूर्णता” को देखते हैं, उसके पीछे की गयी “मेहनत” को नहीं देखते क्योंकि ज्यादातर लोग मेहनत नहीं करना चाहते.
हमारे Double Standards यहाँ प्रूव हो जाते हैं, हमें “सैकड़ों” बार गलत प्रयोग करने वाले “वैज्ञानिकों” पर “श्रद्धा” ज्यादा है

 

 

पर अनादि काल यदि ना भी माने, तो 2500 वर्ष से भी पहले भगवान महावीर ने जो कहा, उस पर “जैनी” होकर भी “शंका” करते हैं और “बुद्धि-बल” से उस बात पर “तर्क” करते हैं जहाँ “बुद्धि” पहुँच ही नहीं सकती.