नवकार महामंत्र का विराट स्वरुप-11

पहले  नवकार महामंत्र का विराट स्वरुप 1-10पढ़ें.

नवकार के दूसरे पद नमो सिद्धाणं में अत्यंत रहस्य छिपा हुआ है.
“सिद्ध” होना हर “आत्मा” का लक्ष्य है.
“सिद्ध” दोबारा कभी जन्म नहीं लेते, वे अनंत सुख के धारक और अनंत शक्तिसम्पन्न हैं – क्योंकि “शरीररहित” है.

हम अभी “शरीररहित” जीवन की “कल्पना” भी नहीं कर सकते.

कुछ लोगों में तो ये भी “शंका” होती है कि जहाँ कुछ करना ही ना हो तो वहां सुख कैसे हो सकता है.
इसीलिए “अरिहंतों” ने साफ़ बताया है कि मोक्ष सुख (सिद्ध गति) को “शब्दों” में नहीं बताया जा सकता.

 

जिस प्रकार “सागर” की “एक बूँद” निकालकर बाहर भेजी जाए और कहा जाए कि ये “विशाल” सागर की एक “बूँद” है, तो किसी को भी ये विश्वास नहीं आ सकता कि –

१. ये विशाल सागर के पानी का ही “स्वरुप” है और

२. सागर कितना विशाल है.

अरे! सागर के पास पहुँच कर भी उसकी वास्तविक विशालता का अंदाज नहीं लगाया जा सकता.

उसके अंदर कितने “रत्न” भरे है, ये तो दिखाई ही नहीं पड़ता. जीवों के जितने  प्रकार “सागर” में हैं, उतने कहीं ओर नहीं पाये जाते. डिस्कवरी चॅनेल भी इस बात को प्रूव करता है.

 

मोक्ष सुख के बारे में हम “जितना भी” जानने की कोशिश करें उसे मात्र “एक बूँद” ही समझें.
जितना ज्यादा हम “मोक्ष” सुख के बारे में जानेंगे, मोक्ष सुख की “शुरुआत” वहीँ से समझना.
क्योंकि मोक्ष सुख “अनंत” है – आकाश की तरह!

 मोक्ष सुख को समझने का कुछ प्रयास:
१. शरीर ना होने के कारण उन्हें भूख-प्यास नहीं लगती.
२. शरीर ना होने के कारण उन्हें ताप -ठंडी नहीं लगती.
३. शरीर ना होने के कारण उन्हें कोई “रोग” नहीं सताता.
४. शरीर ना होने के कारण उन्हें कोई “इच्छा” नहीं होती.
५. शरीर ना होने के कारण उन्हें कोई “दुष्ट ग्रह” नहीं सता पाता.
६. शरीर ना होने के कारण उन्हें किसी की “आज्ञा” का पालन नहीं करना पड़ता.
७. शरीर ना होने के कारण उन्हें “मन,वचन और काया” की जरूरत नहीं होना.

 

मतलब “सातों सुख” उन्हें प्राप्त हैं -सदा के लिए!

जिन्हें ये लगता है कि इन सब में क्या सुख है-तो नीचे लिखे प्रश्नों का जवाब खुद से पूछें:
१. क्या हमें भूख-प्यास नहीं लगती?
२. क्या हमें ताप -ठंडी नहीं लगती?
३. क्या हमें कोई रोग नहीं सताता?
४. क्या हमें रोज नयी इच्छा नहीं होती?
५. क्या हमें “दुष्ट ग्रह” नहीं सताते?
६. क्या हमें “गुरु” या “सरकार” की आज्ञा का पालन नहीं करना पड़ता?
७. क्या हमें “मन” में कभी परेशानी नहीं होती, कभी किसी के कटुवचन सहन नहीं करने पड़ते या कभी काया को कष्ट नहीं पहुँचता?

 

उत्तर है :
हम जहाँ “दुःख” है, उसमें “सुख” ढूंढने के हर संभव प्रयास करते हैं
परन्तु तीर्थंकरों ने जो कहा है, उसे मानने को तैयार नहीं है. 

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