नवकार मंत्र की प्रभावकता : भाग 4

ये कहा जाता है कि नवकार चौदह पूर्व का सार है.
पर हमने आज तक ये “चिंतन” नहीं किया कि ये चौदह पूर्व का सार कैसे है.

कहाँ चौदह पूर्व का ज्ञान और कहाँ ६८ अक्षर में समाया है वो ज्ञान!
हमारी “जड़ बुद्धि” इसे स्वीकार ही नहीं कर पाती  है.

एक चौदह पूर्व धर और एक केवली में मात्र इतना अंतर होता है कि “केवली” को सब कुछ “दिखता” है जबकि “श्रुत केवली( चौदह पूर्व धर ) को “ज्ञान” का उपयोग करना होता है.

 

उपरोक्त वाक्य का गूढ़ अर्थ ये हुआ कि
“चौदह पूर्व” की “सुगंध” इत्र के रूप में आती हैं
“नवकार”गुणने वाले को!

साइज के हिसाब से देखें तो १४ पूर्व (शास्त्र) में से हर “पूर्व” उससे पहले पूर्व से दुगुना है. (इसे जानने के लिए अगली  पोस्ट  पढ़ें) .

श्री सिध्धसेन दिवाकर ने ही “नवकार मंत्र” पर १८००० श्लोक लिखे हैं.

(चौदह पूर्वधर तो ये कहेंगे के नवकार पर लिखे गए ये श्लोक तो बहुत कम हैं यानि .01% भी नहीं है –
श्री सिध्धसेन दिवाकर का भी ये “दावा” नहीं है कि उन्होंने नवकार पर जितना लिखा है वो संपूर्ण है. ये तो मात्र एक प्रयास है – नवकार की  महिमा बताने का).

 

साथ में नवकार को छोटे रूप में उन्होंने :

“नमोsर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्य:”
(१५ अक्षर)

के रूप में प्रस्तुत किया.

एक तरफ उन्होंने नवकार पर १८००० श्लोक लिखे और दूसरी ओर नवकार का “Shortest Possible Version”  देने की “चेष्टा” की.

उनके गुरु ने टोका:
ये “नमोsर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्य:” किस की आज्ञा से लिखा?

“सिद्धसेन  दिवाकर” ने कहा:
वर्तमान में लोग संस्कृत ज्यादा जानते हैं और वह पढ़े लिखों की भाषा हैं इसलिए इसे संस्कृत में रचा.

(जैसे हम आज मान बैठे हैं कि  “English is the language of educated people – मतलब “प्राकृत” भाषा का प्रचलन उस समय इसी सोच के कारण बहुत कम हो गया था).

 

“सिद्धसेन  दिवाकर” को गुरु ने संघ से बाहर किया १२ वर्ष के लिए “महामंत्र नवकार” के नाम पर उसमें “नया कुछ रचने की सजा” के रूप में!

जो नवकार “अनादि काल” से अपने “मूल स्वरुप” में सभी को प्राप्त होता रहा है, उसमें एक अक्षर तो क्या एक बिंदु भी इधर का उधर नहीं किया जा सकता.

ये मानना ही पड़ेगा कि तीर्थंकरों, गणधरों, आचार्यों, उपाध्यायों और साधुओं का हम पर कितना बड़ा उपकार है.

आगे पढ़ें : नवकार मंत्र की प्रभावकता : भाग -5