“मन” भटकता नहीं है : आज तक “आत्मा” भटकी है.

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“मन” भटकता नहीं है : आज तक “आत्मा” भटकी  है.

मन को वश में करो, ये बात बार बार कही जाती है.

ये बात हर किसी के “मन” में बैठ गयी है कि
हमारा मन बहुत भटकता है.
इसलिए हम कोई श्रेष्ठ कार्य नहीं कर पाते.

आपसे प्रश्न पूछता हूँ:

क्या आपको घूमने का शौक है?

उत्तर होगा : ये भी कोई पूछने की बात है!

तो ये “मन” किसका है?

आपका ही तो है!

तो फिर उसको भी तो घूमने का शौक होगा ही! 🙂

ये तो हुई प्रारम्भिक बात.

अब आइये मूल विषय पर.

आप का   जीव ब्रह्माण्ड में कोई भी स्थल
ऐसा नहीं है कि जहाँ वो वह “घूम” कर ना आया हो.
शास्त्रकार इसे जीव का “भटकना” कहते हैं.

 

बच्चे जब दिन भर घर से बाहर रहते हों
तो घर के बड़े-बुजुर्ग भी उनके बारे में यही कहते हैं.

हमने “आत्मा” को भव भव तक समझा नहीं

तो इसे क्या कहेंगे?

जीव का भटकना!

क्योंकि “भटकना” हमारी “आत्मा” का लक्ष्य नहीं है.

किसी को “घूमने” का कितना भी शौक क्यों ना हो,
“घूम” कर आता तो “घर” पर ही है.

एक ही क्षण में “मन” हज़ारों मील दूर जाता है.
ये बात  हर एक  व्यक्ति में है.

 

इस पर नया दृष्टिकोण रखता हूँ.

इसे बड़े आराम से जानिये/ पढ़िए:
तो  आज से ही आपको अपनी शक्तिओं का अंदाज हो जाएगा.

आपके पास “मन” की ऐसी शक्ति है,
जो आपको एक क्षण में हज़ारों मील दूर ले जाती है.

ये “मन” किसका है?

आपका!

तो फिर एक क्षण में इतनी दूर जा सकने कि शक्ति भी किसकी है?

आपकी!

 

इसलिए अब से जब भी मंत्र जप, स्वाध्याय या काउसग्ग करने बैठो
तो ये बात ध्यान में रखो कि
मन तो इधर-उधर जाएगा ही.

परन्तु घूम कर अपने उस मूल स्थान पर आ जाएगा
जहाँ आप उसे लाना चाहते हो.

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