जैन मन्त्रों के बारे में कुछ रोचक जानकारी-2

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पहले  पढ़ें  : जैन मन्त्रों के बारे में कुछ रोचक जानकारी-1

२१. तत्वार्थ सूत्र में श्री उमास्वातिजी  महाराज ने सूत्र दिया है:
“परस्परोग्रहो जीवानाम्”
यानि संसारी जीव एक दूसरे पर उपकार करते हैं.
देव, मनुष्य, तिर्यंच इत्यादि एक दूसरे की सहायता करते हैं.

२२. घंटाकर्ण महावीर चौथे गुणस्थानकवाले देव हैं. श्री बुद्धिसागरजी को उनके गुरु श्री रविसागरजी ने वि.सं.१९५४ के फाल्गुन महीने में श्री घंटाकर्ण मंत्र की दीक्षा दी थी.

 

२३. श्री विमल शाह ने कुम्भारियाजी में अम्बिकादेवी की आराधना की इससे अम्बिकादेवी ने आबू में मंदिर बनवाने में सहायता की.
२४. श्री प्रियंगुसुरी ने बोकड़ा में अम्बिकादेवी को बुलाया और पशु यज्ञ बंद करवाया.
२५. अकबर प्रतिबोधक श्री हीरविजयजी को शासनदेवों की सहायता थी.
२६. श्री जिनदत्तसूरीजी को शासनदेवों की सहायता थी.
२७. कोणिकराजा  को युद्ध में “देव” ने सहायता की थी.
२८. श्री यशोविजय जी ने लिखा है की मैंने गंगा नदी के किनारे “सरस्वती” की आराधना की जिससे सरस्वती ने प्रत्यक्ष होकर वरदान दिया.

 

२९. कुमारपाल राजा को श्री हेमचन्द्राचार्य ने “देवों” की सहायता “सैनिक” उत्पन्न करके से युद्ध में विजय दिलाई और बाद में वो “सैनिक” अदृश्य हो गए.
३०. महुडी में श्री पद्मप्रभु के अधिष्ठायक देव के रूप में श्री घंटाकर्ण महावीर की स्थापना की है. एक श्रावक गांधीजी का अनुयायी था. उसने श्री बुद्धिसागरजी से  विनती की और उन्हें जेल से छुड़ाने के लिए अनुष्ठान करने को कहा. माघ महीने में अनुष्ठान हुआ और गांधीजी जेल से छूटे.
३१. घंटाकर्ण महावीर पूर्व भाव में एक राजा थे. साधुओं, सतियों और धर्मियों की रक्षा करना अपना कर्त्तव्य समझते थे. कुँवारी कन्याओं के शील की रक्षा करने के लिए धनुष बाण से अनेक राजाओं को जीता और राज्य में शांति फैलाई.
३२. श्री घंटाकर्ण महावीर 30 वें वीर हैं (कुल 52 वीर हैं).
३३. कुछ गुजराती जैनी श्री घंटाकर्ण महावीर को “मिथ्यात्वी” मानते हैं. “मानना” और वास्तव में “होना” में जमीन आसमान का फर्क है. क्रिया करने वालों में “मिथ्यात्व” होता है क्योंकि वो उसकी भक्ति अपने “स्वार्थ” के लिए करते हैं.
३४. मंदिर की प्रतिष्ठा, अंजनशलाका की कई विधि रात्रि को ही होती है. देवों के लिए दिन-रात का भेद नहीं होता क्योंकि देवलोक में रात्रि होती ही नहीं है. “देव” “प्रत्यक्ष” भी सूर्योदय के पहले (यानि रात्रि को) ही होते है. क्योंकि ब्रह्म मुहूर्त्त में “वातावरण” शांत होता है. ज्यादातर आचार्य अपनी साधना भी प्राय: रात्रि 12.30-4.30 के बीच में  करते हैं.

 

३५. शासनसम्राट श्री विजयनेमिसूरी, श्री विजयसिद्धिसूरी, श्री सागरानंदसूरी,श्री विजयकमलसूरी, श्री विजयनीतिसूरी, श्री  कृपाचंद्रसूरी इत्यादि आचार्यों ने सूरिमंत्र का जाप प्रात:काल में ही किया है.

३६. श्री मोहनलालजी महाराज ने कहा था कि उन्हें श्री जिनकुशलसूरी (खरतरगच्छ के तीसरे दादा गुरुदेव) जो अभी भुवनपति में देव हैं, ने बार बार सहायता की है और कुछ बार प्रत्यक्ष दर्शन दिए है.

-श्री बुद्धिसागरसूरी,
वि. सं. १९८० श्रावण  सुदी ५ बुद्धिसागर मु.पेथापुर

(Edited by jainmantras.com)