समकित धारी

समकित धारी देवोँ और असमकित धारी देवोँ में उतना ही फर्क है
जितना कि एक प्योर वेजीटेरियन है और दूसरा नॉन-वेजीटेरियन.

समकित धारी देव कभी रुष्ट नहीं होते, परन्तु असमकित धारी देव को एक बार प्रणाम करना शुरू किया और फिर करना भूल गये, तो वो रुष्ट हो जाते हैं.
समकित धारी देव “अहंकारी” नहीं होते. असमकित धारी देव “अहंकारी” होते हैं.

 

जो अधिष्ठायक देव/देवी तीर्थंकरों के मंदिरों में प्रतिष्ठित होते हैं, वो समकित धारी
ही होते हैं.
इसका मतलब उन्हें तीर्थंकरों के प्रति अत्यंत श्रद्धा होती है.
प्रश्न:
क्या हम जैन कुल में जन्म लिए सभी व्यक्तिओं को “समकितधारी” कह सकते हैं?
उत्तर:
सभी चौदह पूर्व धर भी  “समकितधारी” हों ये जरूरी नहीं है.
तो फिर जैन कुल में जन्म लेने वाले ही नहीं, “श्रावक” भी “समकितधारी” हों, ये सोचना भी एक बहुत बड़ी बात है.
प्रश्न:
हम समकितधारी हैं या नहीं, इसकी टेस्टिंग कैसे करें?
उत्तर:
जिसे इसकी वास्तव में चिंता है कि “मैं” समकितधारी हूँ या नहीं, वो “समकितधारी” है.
(जिसे “मोक्ष” में जाने की इच्छा है, वो समकितधारी है).

 

प्रश्न:
“समकितधारी” होने से क्या लाभ है?
उत्तर:
“घूमना” बंद हो जाएगा!
शंका:
पर हमें तो “घूमना” बहुत अच्छा लगता है.
निवारण:
नयी नयी नौकरी लगी हो और बाहर खूब जाना हो, तो बहुत अच्छा लगता है.
पर यही बात किसी नयी शादी-शुदा व्यक्ति से पूछो!
क्या उसे “नौकरी” के कारण बार बार शहर से बाहर जाना पसंद होता है?
शंका:
कहने का मलतब क्या है?
निवारण:
जिस प्रकार “शादी-शुदा” व्यक्ति को एक से “सम्बन्ध” स्थापित होने पर बाहर जाना पसंद नहीं होता (दुखदायी लगता है), उसी प्रकार एक बार “तीर्थंकर” से “सम्बन्ध” स्थापित हो जाने के बाद “समकितधारी” को उससे अधिक अच्छा कुछ नहीं लगता.

सभी तीर्थंकर मोक्ष गए हैं और जो वर्तमान में हैं, वो मोक्ष जाने वाले हैं. उनसे “सम्बन्ध” उसी का “स्थापित” होता है, जो “मोक्ष” जाने वाला है.

Testing Point:

क्या आप निश्चितता के साथ कह सकते हैं कि मेरा “सम्बन्ध” तीर्थंकरों से बहुत ही “घनिष्ठ” है?
यदि हां, तो “तीर्थंकरों” के साथ आपको भी “प्रणाम!”