“ऊपरी हवा” की “हवा” निकालने वाला जैन स्तोत्र

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कल रात(15-8-2016) को 11.30 बजे एक “बेटी” का मैसेज था
कहा कि अंकल, मेरे घर में “चेक की लुंगी पहने”
एक व्यक्ति घूमता दिख रहा है.
(ऐसा आभास हो रहा है).
किसी और को कहना नहीं चाहती,
नहीं तो घर में “डर” बैठ जाएगा.

उससे तुरंत कहा :
पानी के एक गिलास के सामने दृष्टि रखकर
उवसग्गहरं स्तोत्र गुनो
फिर पूरे घर में उस पानी को “छिड़क” दो.
बाकी बचा पानी खुद पी लो.

थोड़ी देर बाद उसका मैसेज आया.
ऐसा करने पर “वो” मेरे पर “दांत पीस” रहा था.

इसका मतलब ये था:
“जो तुमने किया, वो उसे पसंद नहीं आया.”

घबराओ नहीं,
अब ये कुछ नहीं कर सकेगा.

बाद में वो फिर “नज़र” नहीं आया.

बंधुओं और बहिनों,
अपने “जैन स्तोत्रों” पर विश्वास रखो.
रोज उनका “शुद्ध उच्चारण” से “स्मरण” करो.
श्रद्धा रखो.
कहीं “भटकने” की जरूरत नहीं है.

हमारे स्तोत्र ना सिर्फ बाधाएं हरने में समर्थ है,
बल्कि साथ ही सब कुछ देने में समर्थ है,
“मोक्ष” भी !

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