भक्तामर स्तोत्र में “सूर्य” का वर्णन बार बार क्यों आया है? भाग -2

घटना सन्दर्भ :

अपनी ही पुत्री द्वारा शापित महाकवि बाण ने “सूर्य” को प्रसन्न करके अपना कोढ़ रोग मिटाया  और राज दरबार में भारी प्रशंसा पायी.  अपने ससुर “बाण” के द्वेषी जंवाई मयूर ने अपने को ऊँचा दिखाने  के लिए अपने शरीर के अंग काट
डाले और “देवी” को प्रसन्न करके “वापस” पहले वाली अवस्था प्राप्त की. इससे उसकी और भी भारी प्रशंसा हुई.

जैन धर्म” में ऐसे “चमत्कार” दिखाने वाले कोई नहीं है, ये चुनौती संघ के कहने पर “श्री मान तुंग सुरीजी” ने स्वीकार की. परिणामस्वरूप उस समय “जिन शासन” की प्रभावना  तो हुई ही, हम सबको एक महान स्तोत्र मिला : श्री भक्तामर स्तोत्र जिसे सारा जैन समाज १३०० वर्षों से पढ़ रहा है.

 

चूँकि सूर्य और देवी के वरदान के कारण दोनों प्रभाव दिखा पाये, इसलिए श्री मानतुंग सुरीजी ने सर्वप्रथम श्लोक में “आदिनाथ भगवान” का स्मरण इस भाव से किया कि “इन्द्र और देवता” भी उनके “चरणों” में झुक रहे हैं (आदिनाथ भगवान के आगे फिर देवों की महत्ता ही क्या रही – जिस देवी के कारण “मयूर” ने वापस अंग पाये थे, उस  देवी का महत्त्व भी नहीं रहा -वैसे   भी एक “देवी” की शक्ति एक “देव” से बहुत कम होती है).

स्पष्टीकरण:

वैदिक धर्म में “सूर्य” से भी ज्यादा प्रभाव दिखाने वाला और कोई नहीं है. “गायत्री मंत्र” में भी “सूर्य” की ही उपासना की जाती है और उससे बड़ा मंत्र वैदिक धर्म में दूसरा नहीं है.

 

श्री मानतुंग सुरीजी ने श्री भक्तामर स्तोत्र में १० बार “सूर्य” को भगवान के आगे बहुत ही छोटा बताया है. ये
सभी को पता ही होगा  कि श्री महावीर स्वामी के दर्शन करने के लिए “सूर्य और चन्द्र” प्रत्यक्ष आये थे. यहाँ से भी ये साबित होता है कि तीर्थंकरों के पुण्य और प्रभाव के आगे इस तीन लोक में दूसरा कोई है ही नहीं. और सबसे बड़ी बात तो ये है कि उनके “प्रत्यक्ष” ना होने पर भी उनके सुन्दरतम स्वरुप का  “स्मरण” कितना प्रभावशाली है, ये पता पड़ता है.

(जो जिन-मंदिर नहीं जाते और “आशातना” के डर से पूजन का सरे आम निषेध करते हैं , तो कितने बड़े “सुख” से वंचित हैं, जरा खुले मन से चिंतन करें – जो भूल हुई है, उसे आगे से सुधारें और “घर वापसी” का मन बनाएँ).