कहे कलापूर्ण सूरी-3

1. आगम भगवान का पत्र है. उन्होंने ये पत्र गणधरों से लिखवाया है. भगवान ने “पुष्पों” की “वृष्टि” की है, गणधरों ने उन पुष्पों की माला गूंथी  है. पत्र चाहे पोस्टमैन ने दिया, परन्तु है किसका? “प्रेम” पोस्टमैन पर नहीं, लिखनेवाले पर होता है.

2. यदि आगम पढ़ें और भगवान  के प्रति “प्रेम” जाग्रत ना हो तो आपने आगम पढ़ा ही नहीं, ऐसा समझ लो.

3. सुनकर याद रखने की परंपरा भगवान महावीर के बाद वर्षों तक चलती रही. बुद्धि कम हो  गयी तब सब पुस्तकों में लिखा गया. पुस्तकों की वृद्धि बुद्धि की वृद्धि का चिन्ह नहीं है, परन्तु यही मानें की घटती रही बुद्धि का चिन्ह है.

 

4. चर्म-चक्षु (हमारी आँखें) ऊपर छत  देखती है, अधिक से अधिक तो सूर्य, चन्द्रमा और तारे देखती है, परन्तु “श्रुत-चक्षु” (ज्ञान) के श्रद्धा चक्षु तो ऊपर सिद्धशिला (ऐसा स्थान जहाँ आत्मा सदा के लिए मोक्ष में रहती है) देखती है.

5. स्कूल में हमें एक और माता मिलती है: वर्णमाता: “अ” से “ह” तक के अक्षर वर्णमाता कहलाते हैं. इस वर्णमाता को गणधर  भी नमस्कार करते हैं. भगवती सूत्र के प्रारम्भ में इस वर्णमाता को “नमो बम्भीए लिविए” कहकर नमस्कार करते हैं. ब्राह्मी लिपि भगवान ऋषभदेव की देन है. लिपि भगवान ने “प्रकट” की, परन्तु “अक्षर” तो “शाश्वत” ही है.

6. “अक्षरों” में से ही समस्त ज्ञान उत्पन्न होता है. इसीलिए “वर्णमाला” को “ज्ञान की माता” कहा गया है.
वर्णमाता का उपासक ही “नवकारमाता” को प्राप्त कर सकता है और

 

“नवकारमाता” का उपासक ही अष्टप्रवचन रूप तीसरी “धर्ममाता” को प्राप्त कर सकता है.
(वापस पढ़कर याद करें की तीन माताएं कौनसी हैं).

7.तीर्थंकर भी केवलज्ञान की प्राप्ति होने के बाद “केवलज्ञान” के द्वारा धर्मदशना नहीं देते,
इस वर्णमाता से धर्मदेशना देते हैं.
क्रोध पर विजय (काबू) के बिना चौथी माता “ध्यानमाता” नहीं मिल सकती.

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