पच्चक्खाण “ध्यान” की पहली सीढ़ी है.

ज्यादातर व्यक्तियों की ये “शिकायत” है की जैसे ही ध्यान में बैठते हैं कि “सारे ऊट-पटांग” विचार आने लगते हैं.
और वो “शिकायत” भी उनसे करते हैं तो स्वयं इस “बिमारी” के मरीज (patients) हैं. मतलब “दो बीमार” और दोनों को “शिकायत” एक ही! और खोजेंगे लगभग सभी ऐसे ही मिलेंगे.

क्या ध्यान करना इतना कठिन है?

जैन धर्म में एक भी बात ऐसी नहीं कही गयी जो करने में कठिन हो क्योंकि उसे आत्मा की  “अनंत” शक्ति का पता है.  फिर भी पच्चक्खाण (promise)  करने हों जो जैन धर्म ये कहता है कि – यथाशक्ति (As per your capacity)!

आज इस “यथाशक्ति” पर ही चिंतन करते हैं.

 

व्यवहार में यदि कोई किसी से कहे कि “आप धर्म में “थोड़ा” पैसा लगाओ.”
ये “थोड़ा” क्या है और वो “क्यों” कह रहा है?
क्योंकि  कहने वाला “जानता” है कि सुनने वाला “शायद” ही लगाएगा.

और यदि कोई किसी से कहे कि “आप धर्म में “थोड़ा-बहुत” पैसा   लगाओ.”
ये “थोड़ा-बहुत” क्या है और वो “क्यों” कह रहा है?
क्योंकि  कहने वाला जानता है कि सुनने वाला “थोड़ा” लगाएगा और “बहुत” बताएगा. “पट्ट” पर नाम आएगा या नहीं, इसका “भरोसा” भी उसे नहीं होता.

याद रहे बात “ध्यान” करने की चल रही है.
ये हमारा स्वभाव (आदत) है कि  हम  बात “किस” की चल रही होती है, और चलते चलते बात “किसी और की” करने लगते हैं. 🙂

 

प्रश्न:

जैनी छोटे छोटे पच्चक्खाण  करने की भी अनुमति क्यों देते हैं?

उत्तर:
असल में ये “Advertisement Compaign” है हमारे धर्म का! 🙂
आप आधे घंटे के लिए भी “पानी” पीने का त्याग कर सकते हैं.
इसे नाम दिया गया है : धर्म का, और ये रास्ता है पुण्य कमाने का.

इन छोटे छोटे पच्चक्खाण से “जाग्रति” खूब बढ़ती है.

 

मानो कि आप साधारणतया 2 घंटे से पानी पीते हैं. तो आप पच्चक्खाण करने के लिए “योग्य” (eligible) हैं. आप दो घंटे बाद पानी पी भी सकते हैं और नहीं भी.  (Both options are open). दो घंटे बाद यदि आप आधे घंटे और  ना पीना चाहें तो इसे आधे घंटे के लिए और extend  कर सकते हैं. परन्तु शुरू के जो दो घंटे का जो प्रण लिया है, उसे कम नहीं कर सकते यदि आपको पच्चक्खाण सही तरीके से करना  है तो.

आप “खुली” आँखों से भी इस बात का “ध्यान” रख सकें तो आप “ध्यान” करने के अधिकारी बन जाते हैं.
“बंद” आँखों  से (सोते हुवे) तो ऐसे पच्चक्खाण हो भी नहीं सकते.

इससे ये “सिद्ध” हुआ की “ध्यान” करने के लिए “आँखें बंद” करना हरदम आवश्यक नहीं है.

It means it is proved that there is no “necessity” to “close eyes” during  “meditation.”