“जीवन” की असली शुरुआत “चिंतन” से होती है.

चिंतन की शुरुआत :

१. हम सब में “इतनी” “बुद्धि” है कि हम कभी भी
भगवान से “और बुद्धि” देने की प्रार्थना नहीं करते.

प्रार्थना “सद्बुद्धि” देने के लिए करते हैं.

हमारे में बुद्धि ज्यादा है या सद्बुद्धि?

यदि “सद्बुद्धि” होती तो भगवान से इसकी प्रार्थना नहीं करनी पड़ती!
(जो चीज पहले से हो, उसको और कौन मांगेगा)?

 

अब प्रश्न उठता है कि “सद्बुद्धि” का मतलब क्या है?

यहीं से “चिंतन” की शुरुआत होती है.

क्या आप सचमुच “सद्बुद्धि” चाहते हैं?
भगवान से प्रार्थना  करते समय कभी इसका “विचार” भी किया है?

यदि ऐसा विचार नहीं किया है,
तो “बुद्धि” वहां तक अभी पहुंची ही नहीं!

“बुद्धि”, “बुद्ध” और “बुद्धू”
इन शब्दों में बहुत थोड़ा अंतर है.

एक “मात्रा” की कमी या अधिकता से इतना अंतर पड़ जाता है.
इसका “चिंतन” करे.

आपको “चिंतन” करने के लिए कहा गया.

 

आपका  प्रश्न:
हम चिंतन करें ही क्यों?

उत्तर:
सिर्फ मनुष्य ही चिंतन कर सकता है.
देव  भी इतना चिंतन नहीं करते जितना मनुष्य करते हैं.
देव सुखी होते हैं इसलिए उन्हें  “विचार” ज्यादा करने का प्रश्न ही नहीं उठता.

 

शंका:
बहुत से मनुष्य भी बहुत “सुखी” दिखते  हैं,
फिर भी वो बहुत विचार करते हैं.

उत्तर :
“सुखी” “दिखते” हैं,
वास्तव में हैं नहीं.

ये सब “चिंतन” करने की एक “झलक” मात्र है.