करेमि भंते! – 1

एक शाश्वत सूत्र !
जैन धर्म की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क्रिया : सामायिक.

हर जैनी को करने योग्य छ: आवश्यक
सामायिक, लोगस्स, गुरुवंदन, प्रतिक्रमण, काउसग्ग और पच्चखाण.

छ: आवश्यक में से सबसे पहला : सामायिक.
और पहला ही आवश्यक “सामायिक” – कहे जाने वाले जैन कुल में जन्म लेने वाले के लिए पहली ही बॉल “बाउंसर”
और उसके साथ ही क्लीन बोल्ड!

 

दिन भर या यों कहें कि जीवन भर व्यक्ति “फील्डिंग” करता है
पर “बैटिंग” करने का समय आता है तब पहली ही बॉल में “आउट” हो जाता है.

कारण?
सामायिक में आत्मा से “खेलना ” यानि आनंद लेना नहीं आया.
जिस तरह “बाउंसर” देख कर नया खिलाडी घबरा जाता है,
वैसे ही किसी को कहो कि चलो, “सामायिक” करो
तो वो “ऐसे बहाने” ढूंढता है जैसे खिलाडी “बाउंसर” को “खाली” जाने देने में ही अपने को सुरक्षित समझता है. 🙂

जबकि एक एक्सपर्ट प्लेयर “बाउंसर” को सीधे “बाउंड्री” भेजता है!

 

मतलब हमें “सामायिक” के बारे में हमारा दृष्टिकोण बदलना होगा.
“दृष्टि” तभी बदलती है जब हमें उस बारे में पूरी जानकारी हो.
अभी तो हमें “सामायिक” का “सच्चा ज्ञान” ही नहीं है.

“सामायिक”सबसे है “मस्त”
“सुख” समाये  हैं  “समस्त”

सामायिक एक प्रतिज्ञा है!
“प्रतिज्ञा” लेना “वीरों” का काम है, कायरों का नहीं !
सामायिक है “पाप” ना करने की प्रतिज्ञा!
“किये हुवे” पापों से पीछे हटने की प्रतिज्ञा!

 

सामायिक में है :
दिन भर में किये गए कार्यों का विश्लेषण!
Memory Testing with full awareness of deeds!

यही कारण है कि जैनों की बुद्धि बड़ी सूक्ष्म होती है और विस्तृत विचार वाली भी!
पर कब?
जब “ढंग” से सामायिक करेंगे तब!

सामायिक के कोई भी उपकरण का असावधानी से प्रयोग ना हो, बल्कि “उपयोग” हो.
हर क्रिया “धीरे” से और “सावधानीपूर्वक” हो.
इससे सबसे बड़ा फायदा ये है कि “बुद्धि-चातुर्य” बढ़ता है और वही बुद्धि “धंधे” में काम आती है.
धंधे में  थोड़ा सा भी परिवर्तन आता है, तो एक जैन व्यापारी “चौकन्ना” हो जाता है.
वो “चलाने” वाली मानसिकता का नहीं होता, वो खुद मार्केट “चलाने वाला” होता है.

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