Jainmantras.com : जीवन के अनमोल मंत्र

साइट की शुरुआत होने पर यही समझा जाता रहा होगा
कि रोज मंत्र और उससे सम्बंधित रहस्य प्रकट होंगे.

परन्तु “मंत्र” किसके लिए है?
“सुन्दर” जीवन जीने के लिए!

सुन्दर जीवन किसे कहा जाए?

अपनी स्थिति का भरपूर उपयोग करना!
बस, बात इतनी है.

 

एक बच्चे से ये अपेक्षा नहीं होती कि वो “बड़ा” काम करे
परन्तु एक “जवान” से ये अपेक्षा होती है कि
वो कोई ऐसा काम करे जिससे कुल का नाम “रोशन” हो.

किस्सा है श्री हेमचन्द्राचार्य और कुमारपाल राजा का
पर हकीकत में ये “गाथा” है किसी “गुमनाम” की !

एक स्त्री:
बेसहारा-पुत्र नहीं,
निर्धन- धन नहीं,
वृद्ध- शक्ति नहीं
और
विधवा-सौभाग्य नहीं

 

आता था सिर्फ बुनना !
अपनी थोड़ी सी आवक में से कुछ पेट काटते हुवे (कुछ समय भूखी रहकर भी)
सूत से बनी एक “शाल” बनायी
और आचार्य जी को बड़े भाव से “वोहरायी”

कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य जी ने
उसके तन की “प्रकट दरिद्रता” में मन के “अप्रकट राजसी भाव” पढ़े
और करुणामयी दृष्टि से उसे देखा.
तुरंत ही अपनी ओढ़ी हुई “रेशमी” शाल “शिष्य” को दे दी और
“सूती” शाल धारण कर ली.

गुरु के दर्शन करते समय “कुमारपाल” राजा ने “चादर” पर नज़र दौड़ाई तो
कहा : मेरे जैसे सम्राट के होते हुए आपकी ये चादर उचित नहीं है.

 

गुरु ने कहा:

मोटी चादर का मेरे शरीर पर होने से तुम्हें कोई “शर्म” नहीं आनी चाहिए.
“शर्म” आनी चाहिए उनकी जो कुछ नहीं होते हुवे भी अपना सब कुछ
गुरु को समर्पित करते हैं.

“शर्म” आनी चाहिए उस बात की कि इस “विशाल राज्य” में
ऐसे बेसहारा लोग है जिसका
राजा “कुमारपाल” है.

उसी क्षण राजा ने “शर्मिंदगी” से गुरु के आगे शीश नमाया
और उनकी आज्ञा से प्रति वर्ष एक करोड़ स्वर्ण मुद्राओं से एक कोष बनाया
जो ऐसी “बहनों” की “भक्ति” कर सके.

 

विशेष: 

दो घंटों में करोड़ों का फण्ड इकठ्ठा करने वाले जैन समाज को ये बात समझ में आनी चाहिए कि आज सबसे ज्यादा जरूरत कहाँ पर है :

१. साधर्मिक भक्ति,

२. जैन स्कूल और कॉलेज,

३. और इन कार्यों के लिए ऐसे तीर्थ स्थानों का भरपूर उपयोग जहाँ जैन यात्री नहीं के बराबर जाते हों.

(नया कंस्ट्रक्शन कुछ करने की जरूरत नहीं है).

यही Jainmantras.com का मुख्य उद्देश्य है

और यही जीवन के अनमोल मंत्र हैं.

 

प्रश्न :

1. “बुढ़िया” के पास कौनसा “मंत्र” था कि
वो हर वर्ष एक करोड़ स्वर्ण मुद्राएं
धर्म कार्यों में खर्च करने में निमित्त बनी?

2. क्या उसे “रोकड़ा पुण्य” (कॅश बेनिफिट)
उसी समय नहीं मिला?

3. है कोई और “मंत्र” की जरूरत?