श्री उवसग्गहरं महाप्रभाविक स्तोत्र – अर्थ एवं प्रभाव : भाग -7

उवसग्गहरं महाप्रभाविक स्तोत्र के प्रभाव को “शब्दों” से बताना “असंभव” है.

जैसे कोई व्यक्ति “अच्छा” है पर “कितना” अच्छा है तो ज्यादा से ज्यादा ये शब्द निकलते हैं कि “बहुत अच्छा” है! इस “बहुत अच्छे” से पता नहीं पड़ता कि उसमें कौनसा ऐसा “खास” गुण  है जिसके कारण वो “अच्छा” कहा जा रहा है. और पूछने पर लोग कहेंगे कि “उसके बारे में कुछ भी “देखने” की जरूरत नहीं है.”

 

अब ये तो पता पड़ा कि उस व्यक्ति से “सम्बन्ध” (व्यापारिक, घरेलु, इत्यादि) बनाये जा सकते हैं पर वो “कितना” अच्छा” है इसका पता तो उससे व्यवहार करने वाले को ही पड़ेगा. अब इस आदमी से पूछो कि वो आदमी कैसा है तो वो कहेगा कि   “उसके बारे में कुछ भी “देखने” की जरूरत नहीं है.”

यही बात उवसग्गहरं के बारे में जानें. जरा पूछें अपने आप से  :

“उवसग्गहरं” से हमने अपना सम्बन्ध किसके लिए बनाया है?
उत्तर है : “मतलब” का!

उवसग्गहरं स्तोत्र को भद्रबाहु स्वामी ने पार्श्वनाथ भगवान की भक्ति और गुणगान गाने के लिए बनाया है.

 

आपके पास रोज कई व्यक्ति आएं और सभी आपसे  कुछ न कुछ “मांगें” तो आपको कैसा लगेगा?

उवसग्गहरं स्तोत्र के “अधिष्ठायक देव” श्री पार्श्व यक्ष और  धरणेन्द्र हैं. (जहाँ पार्श्वनाथ भगवान की भक्ति होती है, वहां माँ पद्मावती भी अवश्य हाजिर रहती ही है).  श्री पार्श्व यक्ष और  धरणेन्द्र को कभी अपने “बड़े बंधू” की तरह भी नमस्कार करके देखें और मन में क्या “फीलिंग्स” होती है, वो जानें. (आप जब भी अपने बड़ों को प्रणाम करते हैं तो हरदम कुछ “मांगते” हैं क्या)?

 

मन से भक्ति करने पर “बड़े-बुजुर्ग” अपने आप आशीर्वाद देते हैं, “माँगना” नहीं पड़ता.

आपने कभी अपने बुजुर्गों को कहा है क्या कि आप मुझे “जल्दी” आशीर्वाद दे दो!