श्री उवसग्गहरं महाप्रभाविक स्तोत्र – अर्थ एवं प्रभाव : भाग -3

विसहर फुलिंग मन्तं, कण्ठे धारेई जो सया मणुओ
तस्स गह रोग मारी दुट्ठजरा जन्ति उवसामं || २ ||

जो भी मनुष्य “कंठ” में पार्श्वनाथ भगवान को “धारण” करता है
यानि “मुख” से पार्श्वनाथ भगवान के नाम का “उच्चारण” करता है,
उसके “रोग और महामारी” शांत हो जाती है.

यहाँ “कण्ठे धारेई” शब्द पर दूसरे शब्दों की अपेक्षा
ज्यादा “जोर” देकर बोलें.
इससे “मंत्र” पर “विश्वास” ज्यादा और जल्दी आता है.

“कंठ” किसका?
“स्वयं” का!

 

विशेष :
जिन्हें रोग और महामारी ना हो,
वे “कण्ठे धारेई” शब्द पर दूसरे शब्दों की अपेक्षा
ज्यादा “जोर” देकर “ना” बोलें.

मेरा अनुभव है कि ऐसा करने पर जो लोग स्वस्थ हैं,
वो बार बार बीमार पड़ते हैं और ठीक भी हो जाते हैं.

इसका कारण ये है कि किसी को भी पूछो कि
उवसग्गहरं” सूत्र का पाठ क्यों करते हो?

तो उत्तर मिलता है:
ये उपसर्ग हरता है.

 

क्या आप पर “उपसर्ग” आया हुआ है?
उत्तर आता है : नहीं.
तो फिर ये स्तोत्र क्यों पढ़ रहे हो?
उत्तर : *.>^(%@!!!
(नहीं पता).

“मंत्र” सूक्ष्म जगत में “राज्य” करता है.
मंत्र जपने के लिए एकांत चाहिए.
जिससे आप क्या कर रहे हो,
वो सिर्फ आपको और मंत्र के “अधिष्ठित देवों”
के अलावा और किसी को पता ना पड़े.

विशेष:
कई बार बिना बुलाये “दुष्ट देव” भी आ जाते हैं. इसका क्या निवारण है?

निवारण:
इसके लिए श्री भद्रबाहु स्वामी ने “उवसग्गहरं” स्तोत्र की
पहली गाथा में ही व्यवस्था कर दी है.
जानकारी के लिए
श्री उवसग्गहरं महाप्रभाविक स्तोत्र – अर्थ एवं प्रभाव : भाग -२ पढ़ें.

 

शंका :
तो क्या यदि रोग नहीं है तो उवसग्गहरं नहीं पढ़ें?

उत्तर:
सूक्ष्म रोग हर शरीर में रहते हैं जो अभी प्रकट नहीं हुए है.
मन में भावना ये रहे कि ये भी इस स्तोत्र के प्रभाव से नष्ट होंगे
ताकि “प्रभु-भक्ति” बाधारहित और प्रसन्न मन से कर सकें.
यही मानव जीवन का लक्ष्य है.