जैन धर्म में अनुकम्पा

जैन धर्म में अनुकम्पा :

किसी भी जीव (जैन को छोड़कर) के प्रति दया अनुकम्पा कहलाती है.
ये हर जैनी का कर्त्तव्य है.

जैन श्रावक और श्राविका की तो “भक्ति” ही की जाती है,
उनकी सेवा करके आप उन पर कोई उपकार नहीं करते.

 

कारण?

साधू, साध्वी, श्रावक और श्राविका –
ये सब मिलकर चतुर्विध संघ कहलाते है
जिन्हें स्वयं तीर्थंकर भी नमस्कार करते है.

क्यों?

क्योंकि जैन धर्म में जो गुण धारण करता है
उसे ही नमस्कार किया जाता है

 

और तो और

जो गुण पहले धारण करता है
उसे नमस्कार भी पहले ही किया जाता है
भले ही वो उम्र में छोटा हो!

फोटो:

धर्मचक्र