“प्रेम” बड़ा या “आदर” बड़ा?

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धर्म” के प्रति
“प्रेम” हो या “आदर?”
“प्रेम” बड़ा या “आदर” बड़ा?
पहले “आदर” होता है या “प्रेम?”

बहुत ही गंभीर बात है.

पुत्र का माता के प्रति “प्रेम” पहले या “आदर?”

एक माँ अपने पुत्र से क्या चाहती है?
“आदर” या “प्रेम?”

अब निश्चित करें कि
“धर्म” से “प्रेम” करना है
या उसका “आदर?”

किसी का आदर तो “मजबूरीवश” भी किया जाता है.
जैसे प्रजा किसी अफसर या मंत्री का आदर करती है
उसके ओहदे की वजह से.
प्रजा का उनसे वास्तविक प्रेम तो उस बिरले अफसर या मंत्री से ही होता है.
जो खुद जनता को चाहता हो, उनका भला चाहता हो.

जो “धर्म” हमारा कल्याण करे उससे प्रेम होना चाहिए या मात्रआदर?

ज्यादातर आदर तो दिखावे के लिए होता है.
जैसे कि किसी अफसर की हाज़री देते समय उसके प्रति आदर होता है.

पर्व दिवसों में हम धर्म के प्रति “आदर” करते हैं या प्रेम?

संवत्सरी का पर्व हमारे लिए आदरणीय है या अति प्रिय?

सामायिक या प्रतिक्रमण के समय काउसग्ग करना प्रिय है
या “जबरदस्ती?”
जबरदस्ती इसलिए कि उसके बिना
सामायिक या प्रतिक्रमण पूरा नहीं होता है.
और एक बार जो सामायिक ले ली तो पूरी तो करनी ही पड़ेगी.

प्रेम की पराकाष्ठा (उच्चतम स्थिति)
तीर्थंकर से प्रेम कर सकते हैं और उनका आदर भी
गुरु से प्रेम कर सकते हैं और उनका आदर भी
माता से प्रेम करते हैं (“कर सकने” की बात नहीं है)
उनका आदर भी.
ऊपर की तीनों बातों को एक बार “खुद” के लिए “चेक” कर लें.
अंतिम तथ्य:
खुद से प्रेम कर सकते हैं परन्तु खुद का आदर नहीं कर सकते.