जैन मन्त्रों की सहायता से बिज़नेस लॉस रोकें-1

stop business loss with jainmantras

ज्यादातर किस्सों में बिज़नेसमैन की लालसा ही उसे बड़े लॉस की और ले जाती है.
मम्मण सेठ के लोभ का किस्सा जैन शास्त्रों में बहुत प्रसिद्ध  है – जो ओलीजी के पर्व पर श्रीपाल रास में बताया जाता है.
कुछ व्यक्ति अच्छा कमा लेते हैं- बिना बैंक के लोन लिए भी.
अचानक उसमें दुर्बुद्धि जागती है और “सस्ते ब्याज” के चक्कर में “बैंक लोन” लेता है.
वैसे भी आजकल “लोन” लेना आम बात है.

जैन शास्त्र  पूँजी (Capital) के तीन हिस्से करने की बात करते है:
1/3 हिस्सा व्यापार में
1/3 हिस्सा इन्वेस्टमेंट में
1/3  हिस्सा “कॅश”

 

ज्यादातर लोगों को शंका है – ज्यादा कॅश रखकर “बड़ा बिज़नेस” कैसे हो सकता है?
“बिज़नेस बड़ा” करने से मतलब है या “नफा बड़ा” करने से?
बिज़नेस बड़ा करने को तो उधार माल खरीद कर 10 करोड़ का माल बेच दो, पर बेचे हुवे माल का payment  कैसे आएगा?
वर्तमान में “धंधे” की “स्थिति” किसी से छिपी नहीं  है.

जब तेजी होती है, तब व्यापारी कहते हैं, अभी बिज़नेस में खूब पैसे चाहिए.
(मतलब पूँजी और लगाता है- लोन लेकर भी)
जब मंदी होती है, तब व्यापारी कहते हैं, अभी बिज़नेस में से पैसे निकल नहीं सकते.
(मतलब जो माल बेचा, उसका पैसा आ नहीं रहा और जो लगाया वो निकल नहीं सकता).
दोनों ही परिस्थिति में पैसा निकलता नहीं है.
दोष किसका है?
“धंधे” का या “खुद” की स्ट्रेटेजी का?

ये सारी  बातें “मति – ज्ञान” की है क्योंकि हमें कार्य बुद्धि और विवेक से ही करना चाहिए.

 

अब बात आती है – जैन मंत्रों की!

 

जैन धर्म कहता है – “पुण्य” जाग्रत है तो सब कुछ अच्छा होता है.
पुराने जमाने में “सेठानियां” कोई बिज़नेस करती थी जो “सोने” के गहनों से लदी रहती थीं?
नहीं.
उनका पूर्व जन्म  का पुण्य और इस जन्म में “पर्व तिथि” पर “तपस्या” और “धर्म” ही उनके सुख का विशेष कारण रहा.
वैसे भी हिन्दू संस्कृति में 1975 तक “विवाहित स्त्री” के नाम के आगे “देवी” अवश्य लगाया जाता था, क्योंकि वो स्वयं लक्ष्मीस्वरूप मानी जाती थीं.  जब से पढ़ी-लिखी स्त्रियों को “शादी” के बाद अपने नाम के पीछे “देवी” शब्द खटकने लगा, तब से ये “परंपरा” बंद हुई है. ( जो स्वयं ही अपने को “देवी” मानने को तैयार ना हो तो कोई क्या करे )! 🙂

 

 

आज भी जब परिवार का ज्योतिषी (जोशी) “ख़राब समय से बचने के लिए कुछ पूजा-पाठ बताता  है  वो “झक” मारकर, इच्छा ना होते हुवे भी बड़/पीपल  के पेड़ के नीचे पानी देना, शिवजी के दर्शन करना, सूर्य को अर्ध्य देना, मंगल-बुध-शनिवार  का व्रत रखना ये सब “स्वीकार” करना पड़ता है.

ये सब उन्हें करना पड़ता है, जिन्हें जैन धर्म में बताये मन्त्रों का “ज्ञान” नहीं है और यदि है तो उतनी श्रद्धा नहीं है जितनी अपने ज्योतिषी पर है – ऐसे लोगो को सौ बार समझा दो तो भी –  “जरा कुंडली देखो” का भूत उतरता नहीं है.

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