हर व्यक्ति पूछता है : नया क्या है? ये लो नया!

हर व्यक्ति रोज नयी वस्तु चाहता है.

नया मतलब

1. Advanced (which saves Time, Energy and Space),
2. Ready to Use and Throw,
3. User Friendly,
4. Attractive Look,
5. Cost Effective etc. 

धर्म” में भी उसे कुछ नया चाहिए.
इसमें भी “Advanced” चाहिए.
पर इसमें “Ready to Use and Throw” नहीं है

 

यही तो फर्क है “भौतिकता” और “आध्यात्म” में!

“आध्यात्म” ये कहता है कि यदि तुम ये “मनुष्य जीवन” Use  नहीं करोगे तो वो अपने आप “Throw”  हो जाएगा (Ready to Throw only).

जैन धर्म में सीखने के लिए नया इतना है कि
ये जिंदगी कम पड़ेगी.

“ऐसी” 10 या 100 नहीं,
1,00,000  जिंदगियां भी कम पड़ेंगी.

मात्र “आत्मा” पर ही हज़ारों ग्रन्थ लिखे हैं गणधरों, आचार्यों एवं उपाध्यायों ने!

 

फिर भी हमें वो –

1. Advanced (which saves Time, Energy and Space),
2. Ready to Use,
3. User Friendly,
4. Attractive Look,
5. Cost Effective etc.

नहीं लगते.

“आत्मा” नाम के तत्त्व को समझने के लिए मात्र  10 मिनट चाहिए यदि अपनी “बुद्धि” को एक बार अन्य बातों से किनारे रख दें. परन्तु हमारे गुरुओं को पता है कि “जीव”  ये  समझने के लिए तैयार ही नहीं है. इसलिए तरह तरह के उदाहरण देकर हज़ारों ग्रंथों की रचना की “आत्मा” को समझाने के लिए! ताकि जिसे जो ग्रन्थ अच्छा लगे, उससे ग्रहण कर ले.
(परन्तु हमारी तो “बुद्धि” को ही ग्रहण लगा हुआ है कि ये बात भी हमें सूझती नहीं कि ऐसे ग्रन्थ पढ़ने चाहिए).

नयी चीज ढूंढने के लिए “माल्स” में 2 घंटे हम लगा सकते हैं और “स्वयं” के लिए हमें फुर्सत नहीं मिलती.
“बतावो पिछले १० साल में आपने “अपने लिए”  (मौज मस्ती के लिए नहीं) कितना समय निकाला है?

 

प्रश्न:

१. “धर्म” क्या है, क्या आपको पता है?
उत्तर : नहीं

(यदि हाँ, तो आगे पढ़ें. नहीं तो यही रूक जाएँ).
२. क्या आपको “धर्म” का “पालन” करना अच्छा लगता है?
उत्तर : नहीं

यदि हाँ, तो आगे ना पढ़ें. यही रूक जाएँ.
३. क्या आपको “अधर्म” करना अच्छा लगता है?
उत्तर : ( उत्तर आप स्वयं दें )

 

तीसरा प्रश्न “त्रिनेत्र” खोलने जैसा है.
पर यदि कोई आँखें खोलना ही ना चाहे, तो कोई उपाय नहीं है.

(कोई भी ये नहीं कह सकता कि मुझे अधर्म अच्छा लगता है. दुर्योधन जैसे ने भी कहा है : वो “धर्म” क्या है, जानता है और “अधर्म” क्या है वो भी जानता है – हममें से ज्यादातर को ये भी पता नहीं है कि जैन धर्म क्या है? कुछ नाम जरूर पता है कि हमारे तीर्थंकर कौन थे और ये वैसा ही जैसे जैसे प्राइमरी स्कूल में सिखाया  जाता है बच्चों, हमारे प्राइम मिनिस्टर कौन है? और बच्चे एक साथ जोर से चिल्लाते हैं : ……)!   

जरा सोचो :  हमारे गणधरों और आचार्यों ने हज़ारों ग्रन्थ जैन धर्म पर क्यों लिखे?