“मैं” और “अनेकांतवाद”

me aur anekatakanwad

चिंतन करें कि “मैं” कौन हूँ?

मैं किसी का पुत्र हूँ, पिता हूँ, पति हूँ, भाई हूँ, बहनोई हूँ, भांजा हूँ, मामा हूँ, दादा हूँ, पोता हूँ….!
पर मैं स्वयं क्या हूँ, वो मैं अपने आप को जो नाम लोगों ने दिया है, वो “मानता” हूँ.
“मानना” और वही “होना” – दोनों में बहुत अंतर है.

 

आप अपने पाले हुए कुत्ते को “टॉमी” कहते हैं.
उस कुत्ते ने “अपना” नाम “टॉमी” रखा था क्या?
दूसरों की नज़र में वो “टॉमी” है क्या?
दूसरों की नज़र में तो वो कुत्ता ही है ( है भी).
पर  वो भी अपने को “टॉमी” समझने लगता है
और जैसे ही आप “टॉमी” बोलते हो,
वो पूँछ हिलाता हुआ आपके सामने आ जाता है.

हमने भी अपने आप को “नामधारी” समझ लिया है. (जैसे प्रदीप, संदीप, कविता, ममता इत्यादि जिसका जो नाम है – हमें भी जैसे ही हमारे नाम से बुलाया जाता है, हमारे कान खड़े हो जाते हैं.)
(“इस मामले” में कुत्ते में और हममें कोई फर्क नहीं है).

 

पढ़कर १०,००० वाट का झटका लगा होगा.
कि  क्या हमारी सोच भी “कुत्ते” जैसी है?

“खुद” ही चेक कर लो.

स्वयं अपने आप को “आत्मा” ना मानकर इस जन्म में मोतीलाल, पिछले जन्म में लालचंद और आने वाले जन्म में चाँद रतन “बनने” वाला हूँ.  मैं वास्तव में लोगों द्वारा (उल्लू) “बनाया” गया हूँ

(क्योंकि मेरा नाम लोग ही  निकालते हैं) पर अपने आप को एक नंबर का होशियार समझता हूँ.

 

जबकि मैं हूँ एक चेतन!  आत्मा हूँ  (जो temporary इस शरीर में आया हूँ). कुछ “सिद्ध” करने. 
जो अब तक नहीं किया है.
अरबों भव (trillions of birth) (इससे भी ज्यादा) कर चूका हूँ, और भी करूँगा. तब तक करूँगा जब तक “आत्मा” और “शरीर” का भेद मेरे “भेजे” (mind) में नहीं घुसेगा.