“मुर्दा समाज”

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“मुर्दा समाज”

एक बेटी कहती है कि अंकल मेरे पति दो महीने से घर नहीं आते.
जबकि बम्बई में रहते हुवे भी हमारी जॉइंट फॅमिली है.
देवर-देवरानी और “सासू माँ” भी साथ में है
(अपनी सास के लिए किये गए शब्द पर जरा ध्यान दें).
खुद पढ़ी लिखी है और पति दसवीं पास.
किसी मैटर को लेकर “झिक-झिक” शुरू हुई
और पति ने कहा तुझे “सबक” सिखाऊंगा.
अब स्टाफ को भेजकर पति खाना घर से ही मंगवाता है
बनाती मैं ही हूँ पर वो रात को स्टाफ के साथ रहते है.

आत्महत्या तक के विचार आये.
पर मंत्र से मन मजबूत हुआ.
पद्मावती माता के एकासणे करती है.
ये भी एक प्लस पॉइंट है.

देवर-देवरानी इस बात पर उसकी हंसी उड़ाते हैं
कि इतना धर्म करती हो और नतीजा ये है.

कहती है कि इसी देवर को मैंने मेरे बेटे जैसे रखा है
जिसकी शादी को अभी मात्र छह महीने हुवे हैं.
“सास” तो बेचारी अवस्था में है.

मैं क्या करूँ?
“राखी” पर मैं पीहर जाऊं क्या?

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कैसी विडम्बना है?

घर के सदस्यों से परिवार बनता है
और परिवारों से समाज.

परिवार के एक सदस्य पर आफत आती है
तो पूरे परिवार को “झेलना” पड़ता है.

पर एक “परिवार” पर आफत आती है
तो समाज सोचता है हमें क्या?

“मूल” में “समाज”
समाज” ही नहीं रहा.

इसे मात्र पढ़कर “फेंक” मत देना.
ऐसी घटनाएं जैन समाज के लिए “कलंक” हैं.

समाज के आदमियों को पता भी है,
पर “मुर्दा समाज” करे क्या !
.
(मुर्दा तो “रो” भी नहीं सकता ना).

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