“आध्यात्म” या “धर्म?”

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“आध्यात्म” या “धर्म?”
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“धर्म” में “आध्यात्म” होता है.
जबकि “आध्यात्म” का कोई “धर्म” नहीं होता.

जो किसी “धर्म” से “सम्बंधित” नहीं रह कर
सिर्फ “आध्यात्म”” की बात करता है
वो “गुरु” जरूर बन जाता है
पर “ईश्वर” की बात नहीं कर पाता.

सृष्टि की उत्पत्ति और विनाश के विषय में
“जैन-धर्म” “ईश्वर” को “कर्त्ता” नहीं मानता.
“काल” का प्रभाव मानता है.

मात्र इस बात के लिए भी अन्य दर्शन
जैन दर्शन को “अनीश्वरवादी” मानते हैं.
जबकि जैन दर्शन में
“अरिहंत” उनके “ईश्वर” हैं.

“धर्म” एक अनंत काल से चली आ रही “व्यवस्था” है.
“आध्यात्म” में ऐसी कोई “व्यवस्था” नहीं होती.
क्योंकि सभी की “आत्म-स्थिति” एक सी नहीं होती.

ये बहुत ही “गहन” विषय है.
ऊपर लिखी बात तो सिर्फ उसकी एक “झलक” है.

“आध्यात्मिकता” में “व्यवस्था” ना होने के कारण
ज्यादातर लोग आगे जाकर “भटक” जाते हैं
और अपने “अनुयायियों” को भी “भटकाते” हैं.

ये स्थिति तब आती है जब “वास्तव” में
वो “दूसरों” को “वो” ना दें
जो “स्वयं” को प्राप्त हुआ है.

“आध्यात्म” एक “सुप्रीम पावर” है
यदि उसे “स्पीड” से नहीं बहाया गया
तो वो “पथभ्रष्ट” तक कर देता है.

ऐसे बहुत से “उदाहरण ” देखने को मिल जाएंगे.
यहाँ पर “किसी” का नाम लेकर “विवाद” खड़ा नहीं करना चाहता.

जिसे भी “आध्यात्म” में थोड़ा भी “रस” है
वो इस “स्थिति” को बड़े आराम से जान सकता है.

“साधना” करते समय भी
जब बहुत अधिक “पावर”
शरीर में प्रवेश करता है
तो “झटके” (वाइब्रेशन्स) लगते हैं.
“गुरु” की “अनुपस्थिति” साधक को “डरा” भी देती है
कई लोग “साधना” के समय “पागल” भी होते देखे गए हैं.

“आध्यात्मिक पुरुष” को “फॉलो” करना
उसके इस जगत में “शरीर” से “उपस्थित” रहने तक ही होता है
आने वाली “पीढ़ी” उसका “विशेष फायदा” नहीं उठा पाती.

क्योंकि “आध्यात्म” को “शब्दों” से समझाना “संभव” ही नहीं है.

जबकि “धर्म” को “शब्दों” से “समझाया” जा सकता है.
इसीलिए पब्लिक और आने वाली पीढ़ियों के लिए
“आध्यात्म” से अधिक “धर्म” की महत्ता है.

(धर्म में “आध्यात्म” है ही)

प्रश्न:
***
भगवान् महावीर “आध्यात्मिक” पुरुष थे या कुछ अन्य?

उत्तर:
*****
जैसा कि पहले बताया गया है कि “धर्म” में “आध्यात्मिकता” होती है
क्योंकि वो “आत्मा” की बात करता है.
इसीलिए भगवान् महावीर “तीर्थ” की स्थापना करने के कारण
आध्यात्मिक पुरुष भी थे ही.

उन्होंने आचार्य, उपाध्याय, साधू, श्रावक और श्राविका की
अलग अलग व्यवस्था की.

अलग अलग सूत्रों को पढ़ने का अधिकार उनकी “स्थिति” के अनुसार दिया.

“आध्यात्मिकता” में ये “व्यवस्था” नहीं होती
क्योंकि उनके अनुसार इसकी “जरूरत” नहीं है.

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नवकार के “रंग”

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नवकार के “रंग”
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“जीवन” के सभी “रंग” देखने की “इच्छा” करने वाले
“नवकार” के “रंग” देखने की “इच्छा” नहीं करते.
(नवकार का “कलर्ड” फोटो जरूर देखा है)

क्योंकि “नवकार” की बात आने पर
ज्यादातर तो “colourblind” हो जाते हैं.

नवकार का “ध्यान” लगाने की बात आते ही
“मन” भटक जाता है,
– ये “शिकायत” करते हैं.

अब आगे पढ़ें:
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“अरिहंत” का रंग है “सफ़ेद”
और
“साधू” का रंग है “काला.”

सबसे पहले नमस्कार किया गया : अरिहंत को !
(आज तो “अरिहंत” पीछे है और “गुरु” आगे हैं).
और
“साधू” का रंग है “काला !”
(वस्त्र जरूर “सफ़ेद” हैं).

ये काफी “विचारणीय” है.
(चिंतन खुद को ही करना होगा,
बहस को यहाँ “जन्म” नहीं देना चाहता).

बाकी के रंग हैं : लाल, पीला और हरा !
(“नवकार” में ये किसके “रंग” हैं, जरा पता करो).

रंगों के बारे में जब भी बात होती है
तो यही कहा जाता है :
लाल, पीला और हरा !

सफ़ेद और काले की बात नहीं होती.

कारण?
****

“कालेपन” में तो हमसे ज्यादा “अनुभवी” दूसरा नहीं है
और “सफ़ेद” होने का हम सोचते नहीं हैं.
(“सफ़ेद” हो कर करना क्या है)!

इसीलिए “पहला” नमस्कार ही
“अरिहंत” तक नहीं “पहुँच” पाता.
क्योंकि हम तो “बीच” का “आनंद” लेते हैं.

हमें मात्र “सुनकर” “व्याख्यान” का “मजा” लेना है.
करने की “वैसी” तैयारी “मन” में ही नहीं है !

तो अब “रिजल्ट” कैसे आये?

“नवकार” के रंग तो “बरस” रहे हैं
पर हम खुद ही “इतने” काले हैं कि
“दूसरा” रंग हम पर “चढ़ता” ही नहीं है.

तब क्या करें?
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जाप करें :

ह्रीं अर्हम~ नम: ||

ये मंत्र “ॐ अर्हम~ नम:” से अलग है.
ॐ का उच्चारण तो “आत्म-साक्षात्कार” करवा देता है.

परंतु जिसके “पाप” अभी हैं
उन्हें नष्ट करने के लिए “ह्रीम~” जरूरी है.

“ह्रीम~कार” में “चौबीस तीर्थंकरों” की विद्यमानता है.

प्रश्न:
***
हमारी “विद्यमानता” किस “अक्षर” में है,
ये “चिंतन” का विषय है.
“उत्कृष्ट ध्यान” का “विषय” है.

“जिसे” इस बात का ज्ञान है,
उसे और ज्ञान लेने की जरूरत नहीं है.

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लोगस्स

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“लोगस्स सूत्र” में तीर्थंकर के केवली और सिद्ध होने की दोनों बातें क्यों कही गयी है?
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तीर्थंकर पहले केवली बनते हैं.
फिर “धर्म-देशना” देते हैं.
फिर “सिद्ध-शिला” में
अनंत काल के लिए स्थित होते हैं.

*लोगस्स सूत्र*
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लोगस्स = लोक में
उज्जोअ = प्रकाश
गरे = करने वाले
धम्म = धर्म रुपी
तित्थ = तीर्थ का
यरे = प्रवर्तन करने वाले
जिणे = विजेता ( राग द्वेषादि के)
अरिहंते = त्रैलोक्य पूज्यों की
कित्तइस्सं = स्तुति करूँगा/करुंगी
चउवीसं पि = चौबीसोें
केवली = केवलियों की
उसभं = श्री ऋषभदेव
अजिअं = श्री अजितनाथ को
च = और
वंदे = मैं वंदन करता हुँ
संभवं = श्री संभवनाथ
अभिणंदणं = श्री अभिनंदन स्वामी को
च = और
सुमइं = श्री सुमतिनाथ को
च = और
पउमप्पहं = श्री पद्मप्रभ स्वामी को
सुपासं = श्री सुपार्श्वनाथ को
च = और
जिणं = जिनेश्वर को
चंदप्पहं = श्री चंद्रप्रभ
वंदे = मैं वंदन करता हुँ
सुविहिं = श्री सुविधिनाथ
च = यानि
पुप्फदंतं = श्री पुष्पदंत को
सीअल = श्री शीतलनाथ
सिज्जंस = श्री श्रेयांसनाथ
वासुपुज्जं = श्री वासुपूज्य स्वामी को
च = और
विमलं = श्री विमलनाथ
मणंतं = श्री अनंतनाथ
च = और
जिणं = जिनेश्वर को
धम्मं = श्री धर्मनाथ
संतिं = श्री शांतिनाथ को
वंदामि = मैं वंदन करता/करती हुँ
कुंथुं = श्री कुंथुनाथ
अरं = श्री अरनाथ
च = और
मल्लिं = श्री मल्लिनाथ को
वंदे = मैं वंदन करता/करती हुँ
मुणि – सुव्वयं = श्री मुनिसुव्रत स्वामी
नमि = नमिनाथ को
जिणं च वंदामि = जिनेश्वर को में वंदन करती हुँ
रिट्ठ-नेमिं = श्री अरिष्ट नेमि (नेमिनाथ) को
पासं = श्री पार्श्वनाथ
तह = तथा
वद्धमाणं च = श्री वर्धमान स्वामी (महावीर) को
एवं = इस प्रकार
मए = मेरे द्वारा
अभिथुआ = स्तुति किये गये
विहुय = से रहित
रय = रज
मला = मल
पहीण = मुक्त
जर = वृद्धावस्था
मरणा = मरण से
चउ-वीसं पि = चौबीसों
जिणवरा = जिनेश्वर
तित्थ = तिर्थ
यरा =प्रवर्तक
मे = मेरे उपर
पसीयंतु = प्रसन्न हों
कित्तिय = कीर्तन
वंदिय = वंदन
महिया = पूजन किये गये हैं
जे = जो
ए = ये
लोगस्स = लोक में
उत्तमा = उत्तम हैं
सिद्धा = सिद्ध हैं
आरुग्ग = आरोग्य के लिए
बोहिलाभं = बोधि लाभ
समाहि -वरं = भाव समाधि
मुत्तमं = उत्तम
दिंतु = प्रदान करें
चंदेसु = चंद्रो से
निम्मल = निर्मल
यरा = अधिक
आइच्चेसु = सूर्यो से
अहियं = अधिक
पयासयरा = प्रकाशमान
सागर = सागर से
वर = श्रेष्ठ
गंभीरा = गंभीर
सिद्धा = सिद्ध भगवंत
सिद्धिं = सिद्धि
मम = मुझे
दिसंतु = प्रदान करें

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परंतु अभी सोशल मीडिया में ये मैसेज वायरल  है:

1)बच्चों को आशीर्वाद इस तरह से देना
“तिथ्थयरा मे पसीयन्तु ”

(तीर्थंकर भगवान का आशीर्वाद तुम्हारे साथ हो)

2) बच्चे कोई काम से बाहर जारहा हो तो
” सिध्दा सिध्दि मम दिसन्तु ”

(भगवान आप का कार्य सिद्ध करे)

3) आप खुद घरसे किसी काम के लिए निकलते समय
” इच्छाकारेण संदिसह भगवन् ”

कहकर घर से निकले” आप के इच्छा के अनुसार भगवान आप का कार्य सिद्ध करेंगे

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लोगस्स का ये “निम्नतर प्रयोग” है.
लोगस्स देता है सम्यक्त्व !
और कहाँ उपाय कर रहे हैं : मिथ्यात्व का पोषण करने के लिए !
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“धर्म सम्प्रदाय” से “चिपक” कर रहना “मुक्ति” में बाधक है.

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“व्यक्ति” जब किसी सीमा में “बंध” जाता है
तब अपना “विकास” खो देता है.

यदि “अपना” “व्यक्तित्त्व” नहीं खोना है
तो हमें किसी भी “धर्म-सम्प्रदाय” से नहीं बंधना है.

(क्योंकि “धर्म” तो “खुद” को अपनाना है ना !
हम कोई “सम्प्रदाय” चलाने के लिए “पैदा” थोड़ी हुवे हैं !

परंतु हम जिस सम्प्रदाय में हैं,
उसे “छोड़ना” भी नहीं है.

शंका
***
कहना क्या चाहते हो?

उत्तर:
***
अपनी रोजी रोटी के लिए तो परिवार
अपनी एक मात्र संतान को भी शहर के बाहर
कमाने के लिए भेज देता है.

परंतु इसका अर्थ ये नहीं कि
उसे “घर” से “बाहर” निकाल दिया गया है.

मतलब?
****

उत्तर:

हर पंथ की अपनी “मर्यादा” (limitations) होती है.
यदि दृष्टि “वहीँ” तक रखी
तो “अनेकांत” पढ़ना व्यर्थ है.

सार:
***
कोई भी धर्म सम्प्रदाय
किसी भी सम्प्रदाय की
“मान्यताओं” का “विरोध” ना करे.

यानि अपने अनुयायिओं को भी “गलत” शिक्षा ना दे.
सिर्फ अपनी ही “बात” सही है,
ये “घुट्टी” पिलाना बंद करे.

फिर भी यदि ऐसा हो तो क्या करें?
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ऐसे “संघ” को तिलांजलि दे दें
और अपनी “सोच” से “सच्चे धर्म” के बारे में “खोज” करें.

भगवान् महावीर ने भी “सत्य” की खोज
“स्वयं” करने के लिए कहा है.

इसका रिजल्ट क्या आएगा?
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तुरंत ही जैन समाज संगठित हो जाएगा.

फोटो: श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ, गलेमंडी, सूरत 

क्या है एक “जैन मंदिर?”

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क्या है एक “जैन मंदिर?

1. अद्भुत “स्थापत्य कला”

2. “वास्तु शास्त्र” के सिद्धांतों का संपूर्ण और सूक्ष्मतम पालन
3. “ज्योतिष शास्त्र” के अनुसार शुभतम मुहूर्त्त में खनन कार्य
4. सिद्ध मन्त्रों से प्रतिमाजी की “स्थापना”
5. बहुमूल्य द्रव्यों से “अंजन शलाका”
6. “सिद्धचक्र यन्त्र” की स्थापना

7. शांत वातावरण
8. अट्ठाई महोत्सव
9. मन में आनंद का उल्लास
10. नृत्य नाटिका
11. वातावरण में दूर दूर तक गूंजती हुई घंट की मधुर ध्वनि
12. धन का सदुपयोग
.
– एक जिन मंदिर की स्थापना से जिन दर्शन-पूजन से
हज़ारों वर्ष तक लोग “समकित” पाते रहते हैं.

13. आकाश को छूता हुआ ध्वज
14. देवलोक जैसा रंग मंडप
15. गर्भ गृह जो हमें अपनी आत्मा के अंदर भगवान् को प्रवेश करवाता है.

16. स्वच्छ जल से अभिषेक
17. धूप, दीप, चामर से प्रभु-भक्ति
18. सुगन्धित चन्दन, कर्पूर, बराश इत्यादि से प्रभु पूजा
19. पुष्प समर्पण
20. अद्भुत सूत्रों का पठन
21. शास्त्रीय संगीत की लयबद्ध ध्वनि

और

“चैत्यवंदन” करते समय “यौगिक क्रियाओं सहित”
प्रभु की स्तुति, स्तोत्र, स्तवन और ध्यान !

और कुछ बाकी रह जाता है
तन-मन को प्रसन्न करने के लिए?

ऊपर से “अनंत पुण्य का सर्जन”
जो “मोक्ष” तक ले जाता है.

विशेष
****

विश्व प्रसिद्ध देलवाड़ा-आबू जैन मंदिर के निर्माण के समय
“अनुपमा देवी” ने अद्भुत भक्ति की और
“पुण्य” अर्जित कर वर्तमान में महाविदेह क्षेत्र में
“केवलज्ञान” प्राप्त कर चुकी है.

मंदिर निर्माण करवाने वाले
“वस्तुपाल-तेजपाल” भी वर्तमान में देवलोक में हैं और
एक भव करके “केवलज्ञान” प्राप्त करेंगे.

अब कहो:
*****

“जिन मंदिर” में “आशातना” का “ढोल पीटने वाले”
सही हैं या गलत !

फोटो:
****
2000 वर्ष प्राचीन कुलपाक जी जैन तीर्थ
(जब अन्य जैन सम्प्रदायों का अस्तित्त्व भी नहीं था).

ध्यान कैसे करें?

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1. अगर हम संस्कृत भक्तामर स्तोत्र के श्लोक को आँख बंद करके पूर्ण ध्यान से, अपनी बुद्धि के अनुसार धीरे धीरे शुद्ध पढ़ें तो क्या ये भी ध्यान करना कहलायेगा ?
और
2. क्या ऐसे हमे ध्यान की प्रैक्टिस करनी चाहिए.

प्लीज उत्तर दें.

पूर्वभूमिका:
*******

“भ्रम” से हमने ये मान लिया है
कि “शिविर” में जाने से ही ध्यान सीखा जाता है.
“अमुक मुद्रा,” “श्वास,” “चक्र” “कुंडलिनी,” “प्राणायाम” इत्यादि
को इतने दिन बताया जाता है कि “व्यक्ति” सोचता है ये मेरे “बस” का नहीं है.

हकीकत में ये सब “ट्रेनर” के “पब्लिसिटी स्टंट” हैं.
इन सबको अपने अपने “फॉलोवर्स” बनाने हैं.

जबकि ध्यान है “मुक्त” होने का “अभ्यास”
परंतु लोग “बन” रहे हैं “चेले”

१. जो प्रक्रिया आपने बतायी है, वही ध्यान है.
हर किसी के ध्यान की “स्थिति” अलग होती है.
इसीलिए सभी एक सी ध्यान-विधि करते हुवे भी
“एक ही स्थिति” तक नहीं पहुँचते.

(ट्रेनर की उनको “ऊँचा” पहुँचाने की “हार्दिक इच्छा” भी नहीं होती).

“किसी वस्तु या विषय” पर “एकाग्रता” ही ध्यान है.
सतत उसी विषय पर “चिंतन” करना ध्यान है.

२. ऐसे ध्यान करने से बहुत ही जल्दी उच्च स्थिति प्राप्त होती है.

कारण – “मंत्र” जो साथ में है ध्यान के साथ !

“अत्यंत पुण्य” प्रकट करने वाला मंत्र

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“अत्यंत पुण्य” प्रकट करने वाला मंत्र

जिन्हें आज तक जीवन में कुछ भी “प्राप्त” नहीं होने की शिकायत है
उनके लिए Special Treatment

जिन्हें अभी और भी “प्राप्त” करना है,
उनके लिए “Extra Bonus”

जिन्हें मुक्त होना है :
उनके लिए है Life Time Achievement !

एकदम छोटा सा सूत्र और प्रभाव …
(नहीं कह सकते, इतना है)

“नरकायु” को भी “शांत” करने वाला

भावार्थ :

स्वर्ग, पाताल और तिर्यंच लोक में जो कोई भी नाम के तीर्थ (प्रसिद्ध) हैं,
और उनमें जो प्रतिमाएं हैं,
उन सभी को मैं वंदन करता/करती हूँ.

तीर्थ स्थान:
श्री शत्रुंजय, गिरनार, तरंग, शंखेश्वर, कुम्भारिया, आबू, रणकपुर, केसरियाजी, बामनवाड़ा, मांडवगढ़, अंतरिक्ष, मक्षी, हस्तिनापुर, सम्मेतशिखर, राजगृही, काकांदी, क्षत्रियकुंड, पावापुरी, चम्पापुरी, सेरिस, कुलपाक, फळोधी, स्तंभन (कच्छ), अजाहरा, भोयानी, वरकाणा, पानसर, शेरिसा, वामज, मातर, जीरावला, कापरड़ा जी, सहस्त्रफ़णा, गौड़ीजी ….अनेक !

तीनों लोक में :
8 करोड़ से भी अधिक शाश्वत तीर्थ हैं
और 15 अरब से भी अधिक प्रतिमाएं हैं.

इन सभी तीर्थ और प्रतिमाओं जी को “नमस्कार”
“जं किंचि” सूत्र (मंत्र)
मात्र एक बार पढ़ने से हो जाता है.

अहो ! मेरा जिनशासन महान है !

“रक्षा-बंधन” स्पेशल

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“जग चिंतामणि
जग नाह….
जग रक्खण
जग बन्धव…….
“अरिहंत” जगत के “नाथ” हैं
जगत के “बंधू” भी हैं.
और
जगत की “रक्षा” करने वाले भी हैं.
“बंधू” मतलब “भाई” हैं.
और “रक्षा” करने वाला
सबसे पहले “भाई” होता है.
हम “संसार” में रहते हैं.
यद्यपि “लौकिक रिश्ते” शाश्वत नहीं हैं
फिर भी ये “संसार” का “व्यवहार” है.
जैन-धर्म “व्यवहार” निभाने से मना नहीं करता
परंतु उसमें “रमने” से मना करता है.
इसलिए “भव-भव” से “रक्षा” करने के लिए तो
भगवान् को भी “राखी” चढ़ाये.
(देव-देवी को तो “चढ़ाते” ही हैं).
भावना करें कि भगवान् की “शरण” (रक्षा)
सदा के लिए प्राप्त हो.
“भाई” भी “धर्म-बंधू” है
इसलिए “उसे” राखी बांधते समय भी यही भाव रखें
तो ये “लौकिक पर्व” भी
अलौकिक” बन जाएगा.

माता और पुत्र

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माता और पुत्र 

एक गुरूजी ने आदेश दिया है कि
मैं “माता पदमावती” पर कुछ लिखूं.

“माता” पर “पुत्र” क्या लिखेगा?
पुत्र जब माता के पास हो तो माता को कुछ और नहीं चाहिए
जबकि पुत्र को तो “माता” भी चाहिए और “जो मन करे” वो भी चाहिए.

पुत्र तो जो चाहे “कह” देगा
पर “माता” तो खुद पुत्र की इच्छा भी जानती है.
और उसके लिए क्या सही है, क्या गलत,
ये भी जानती है.

इसलिए जो काम नहीं हो रहा है,
मतलब वो काम करने की माता की “मनाही” है.
( इस बात को स्वीकार कर लो – सदा के लिए )

माता तो स्वयं हाज़िर ही है

परंतु हम तो उन्हें “मूर्ति” मानते हैं.
जबकि उन्हें “चुंदरी” भी “चढ़ाते” हैं.

अपनी माँ के लिए कभी “साड़ी” लाये हैं?
ये सवाल “सभी पुत्रों” से है.

यदि इसका उत्तर हाँ है,
तो “माँ” पद्मावती भी आप पर प्रसन्न ही है,
कोई साधना करने की जरूरत नहीं है.
(मात्र रोज प्रणाम किया करें).

यदि इसका उत्तर ना है,
तो कुछ देर “अपनी माँ” के साथ बैठकर “रो” लो.
( विश्वास करना – माँ तुम्हें और “रोने” नहीं देगी).

“मुर्दा समाज”

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“मुर्दा समाज”

एक बेटी कहती है कि अंकल मेरे पति दो महीने से घर नहीं आते.
जबकि बम्बई में रहते हुवे भी हमारी जॉइंट फॅमिली है.
देवर-देवरानी और “सासू माँ” भी साथ में है
(अपनी सास के लिए किये गए शब्द पर जरा ध्यान दें).
खुद पढ़ी लिखी है और पति दसवीं पास.
किसी मैटर को लेकर “झिक-झिक” शुरू हुई
और पति ने कहा तुझे “सबक” सिखाऊंगा.
अब स्टाफ को भेजकर पति खाना घर से ही मंगवाता है
बनाती मैं ही हूँ पर वो रात को स्टाफ के साथ रहते है.

आत्महत्या तक के विचार आये.
पर मंत्र से मन मजबूत हुआ.
पद्मावती माता के एकासणे करती है.
ये भी एक प्लस पॉइंट है.

देवर-देवरानी इस बात पर उसकी हंसी उड़ाते हैं
कि इतना धर्म करती हो और नतीजा ये है.

कहती है कि इसी देवर को मैंने मेरे बेटे जैसे रखा है
जिसकी शादी को अभी मात्र छह महीने हुवे हैं.
“सास” तो बेचारी अवस्था में है.

मैं क्या करूँ?
“राखी” पर मैं पीहर जाऊं क्या?

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.
कैसी विडम्बना है?

घर के सदस्यों से परिवार बनता है
और परिवारों से समाज.

परिवार के एक सदस्य पर आफत आती है
तो पूरे परिवार को “झेलना” पड़ता है.

पर एक “परिवार” पर आफत आती है
तो समाज सोचता है हमें क्या?

“मूल” में “समाज”
समाज” ही नहीं रहा.

इसे मात्र पढ़कर “फेंक” मत देना.
ऐसी घटनाएं जैन समाज के लिए “कलंक” हैं.

समाज के आदमियों को पता भी है,
पर “मुर्दा समाज” करे क्या !
.
(मुर्दा तो “रो” भी नहीं सकता ना).

“ऊपरी हवा” की “हवा” निकालने वाला जैन स्तोत्र

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कल रात(15-8-2016) को 11.30 बजे एक “बेटी” का मैसेज था
कहा कि अंकल, मेरे घर में “चेक की लुंगी पहने”
एक व्यक्ति घूमता दिख रहा है.
(ऐसा आभास हो रहा है).
किसी और को कहना नहीं चाहती,
नहीं तो घर में “डर” बैठ जाएगा.

उससे तुरंत कहा :
पानी के एक गिलास के सामने दृष्टि रखकर
“उवसग्गहरं” स्तोत्र गुनो
फिर पूरे घर में उस पानी को “छिड़क” दो.
बाकी बचा पानी खुद पी लो.

थोड़ी देर बाद उसका मैसेज आया.
ऐसा करने पर “वो” मेरे पर “दांत पीस” रहा था.

इसका मतलब ये था:
“जो तुमने किया, वो उसे पसंद नहीं आया.”

घबराओ नहीं,
अब ये कुछ नहीं कर सकेगा.

बाद में वो फिर “नज़र” नहीं आया.

बंधुओं और बहिनों,
अपने “जैन स्तोत्रों” पर विश्वास रखो.
रोज उनका “शुद्ध उच्चारण” से “स्मरण” करो.
श्रद्धा रखो.
कहीं “भटकने” की जरूरत नहीं है.

हमारे स्तोत्र ना सिर्फ बाधाएं हरने में समर्थ है,
बल्कि साथ ही सब कुछ देने में समर्थ है,
“मोक्ष” भी !

उवसग्गहरं स्तोत्र में “विसहर” शब्द का प्रभाव

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उवसग्गहरं स्तोत्र में “विसहर” शब्द बहुत ही प्रभावशाली है.
परंतु अधिकतर लोग इसका उच्चारण “विष्हर” करते हैं.

ये हरता है : मन का विष (बुरे विचार)
ये हरता है : शरीर का विष (रोग)
ये हरता है : वाणी का विष (कड़वे वचन)
ये हरता है : दरिद्रता का विष
ये हरता है : क्रोध का विष
हे हरता है : अभिमान का विष
ये हरता है : माया का विष
ये हरता है : लोभ का विष

 

कितना कहें,
अकेला उवसग्गहरं स्तोत्र सभी कुछ देने में समर्थ है
और जो नहीं होना चाहिए, उसको “हरने” में समर्थ है.

क्या अब भी हम “पार्श्वनाथ” की शरण में नहीं जाएंगे?
एक “शब्द” जो हमारी सब समस्यायों का निवारण कर सकता है
तो फिर “पार्श्वनाथ भगवान्” की महिमा का वर्णन “शब्दों” से कर पाएंगे?

 

बंधुओं और बहिनों !

दूसरे धर्म और उनकी क्रियायों, मन्त्रों को छोडो.
अपने घरों को टटोलो, किस किस को “घर” में “घुसा” रखा है
फिर भी “रोना” जारी है (समस्यायों का अंत नहीं हुआ).

घर में सिर्फ एक पार्श्वनाथ की प्रतिमा पर्याप्त है
और एक उवसग्गहरं स्तोत्र पर्याप्त है
हमारे सभी दुखों का निवारण करने के लिए
और सभी सुखों को प्राप्त करने के लिए.

 

(जिन्हें सांसारिक सुख नहीं चाहिए, उन्हें ये स्तोत्र मोक्ष देने में भी समर्थ है
व्यक्ति यदि नहीं चाहे, तो भी ये स्तोत्र उसे “पकड़कर” “मोक्ष” की ओर “धक्का” दे देगा
जैसे कि “तैरना” सिखने वाले को “शिक्षक” पानी में “धक्का” देता है,
जबकि वो “पानी” में जाने से डरता है
और फिर सीखने के बाद…..तैरता ही रहता है) .

और जानने के लिए पढ़ें:
जैनों की समृद्धि के रहस्य
(दिसम्बर,2016)
Publisher : jainmantras.com
Price : Rs.10,100/-

बिज़नस का पैसा रुका हुआ है, मैं किस मंत्र का जाप करू?- Part I

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प्रश्न:
बिज़नस का पैसा रुका हुआ है,
मैं किस मंत्र का जाप करू?
उत्तर:
बिज़नेस में पैसा रुकने के कई कारण होते हैं.
 
१. “ज्यादा बिज़नेस” करने की चाह में “गलत” आदमी को माल बेचा हो.
२. जब माल बेचा तब बिज़नेस अच्छा था, पर पेमेंट ड्यू होते समय “बिज़नेस” मंदा हो गया हो.
३. माल के भाव ही कम हो गए हों (जैसे डिज़ाइन बदल गयी हो).
 
पहले वाले किस्से में जिसे माल बेचा है उसके ग्रह “अच्छे” हैं या नहीं, कह नहीं सकते. पर उसकी नियत अच्छी नहीं है, ये बात पक्की है. ये भी हो सकता है कि जिस तरह “हमें” “बिज़नेस” करना ना आता हो, वैसे ही उसे भी ना आता हो और उसका पैसा भी फंसा हुआ हो.
 
दूसरे और तीसरे किस्से में माल लेने वाले और बेचने वाले दोनों के ग्रह ख़राब हैं, ये पक्की बात है.
 
ये तो हुआ “स्थिति” का हुआ “व्यावहारिक बुद्धि” से विश्लेषण.
यदि “गलत” आदमी को माल बेचा है, तो “पैसा” तभी आएगा जब वो “सही” हो सकेगा. ऐसे किस्सों में “मंत्र” विज्ञान का सहारा लेने पर बहुत ज्यादा समय लग सकता है क्योंकि “दूसरे” की “बुद्धि” को “बदलना” आसान नहीं है. (हमारी ही बुद्धि को “बदलना” कहाँ आसान है)!
 
जन्म कुंडली में कर्म स्थान (दसवां घर), भाग्य स्थान (नौवां घर), लाभ स्थान (ग्याहरवां घर) और धन स्थान (दूसरा घर) का विश्लेषण करने पर ये निश्चित हो सकता है की “दोष” कहाँ पर है!
 
अलग अलग स्थिति में अलग अलग मंत्र का प्रयोग करना होता है.
 
मूल रूप से पैसा फंसने का कारण “राहु” ग्रह का दूषित होना है. क्योंकि वो दिमाग को भ्रमित करता है. ऐसा होने पर व्यापारी को माल बेचते समय बहुत नफा नज़र आता है पर हकीकत में मूल पैसा भी नहीं आता.
इससे बचने के लिए जैन उपाय:
 
सबसे पहले अरिहंत की “वास्तव” में शरण में आएं.
अरिहंत जैसी “समृद्धि” और किसी के पास नहीं होती.
पर आश्चर्य इस बात का है कि वो उसे भोगते जरा भी नहीं हैं.
 
एक जैन होने के नाते “श्रावक” का कर्त्तव्य है
कि हम कमाएं तो “धर्म कार्यों” को पूरा करने के लिए.
(गृहस्थी चलाने के लिए तो पैसा चाहिए ही कितना)?
 
जिसने समय समय पर “दान” दिया है,
उसका “पैसा” कभी फंसता या डूबता नहीं है.
(कुछ डूबता भी है,तो भी वर्ष के अंत में तो नेट नफा ही होता है).
(इसका रहस्य “जैनों कि समृद्धि” के रहस्य – पुस्तक में प्रकट किया जाएगा).
 
इसलिए सबसे पहले ये चेक कर लें
कि अपनी आय का कम से कम
10 प्रतिशत भी दान में लगाया है?
क्योंकि ज्यादातर तो अपनी आय का 2 प्रतिशत भी
“धर्म-कार्य” में पैसा खर्च नहीं करते.
यदि नहीं किया है, तो पहले इस “पहलू” पर “काम” करना शुरू कर दें.
(थोड़ी रकम से ही सही,
यदि अभी “स्थिति” नहीं है तो मन में ही ऐसा सोचना चालू कर दें
कि पैसा आने पर इतना धर्म कार्य में लगा दूंगा,
“पुण्य” आज से ही प्रकट होना शुरू हो जाएगा).
 
कोई मंत्र जप की जरूरत नहीं है.

काउसग्ग : जैन विधि से “ध्यान” की “सरलतम” व्याख्या

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काउसग्ग : जैन विधि से “ध्यान” की “सरलतम” व्याख्या

काउसग्ग में सबसे पहले “शरीर” का भान भूलना है.
(जैसे कि “दिगंबर” साधू अपने “शरीर” का भान भूल चुके होते हैं).

पहले इसका खूब अभ्यास कर लो.

एक पोस्ट में मैंने रोज रात को सोते समय “मरने” की बात कही है, 6-8 घंटे के लिए .
ये भी “शरीर” और उससे सम्बंधित जो रिश्ते नाते हैं, उनसे “ममत्व ” तोड़ने के लिए है.

जब शरीर से ममत्व नहीं रहेगा,
तो भौतिक साधनों पर भी ममत्व नहीं रहेगा
फिर “ध्यान” सीधा “आत्मा” पर ही लगेगा.

बस अपना काम बन गया,
जो जन्म-जन्मांतर में आज तक नहीं बना था.

आगे की स्टेज आप खुद अभ्यास करते करते पा लोगे.

विशेष:
काउसग्ग में कोई मंत्र जप की आवश्यकता नहीं होती.
“नवकार” और “लोगस्स” का काउसग्ग तो नौसिखिए या “सामान्य श्रावकों” के लिए है,
जो अभी “उत्कृष्ट” ध्यान नहीं कर पाते.

“उत्कृष्ट” ध्यान करने वाले को तो एक स्टेज के बाद “आँखें” ही बंद नहीं करनी पड़ती.

जब “ज्ञान” प्रकट हो जाता है, तब फिर क्या “व्यक्ति” आँखें बंद करके “ध्यान” लगाएगा?
(“ज्ञान” के लिए “ज्ञान-चक्षु” शब्द भी प्रयोग में आता है).
इसीलिए तीर्थंकरों की आँखें “खुली” होती है,
क्योंकि उनके मुख से निरन्तर “ज्ञान की गंगा” बहती है.
(“आँखें” बंद करके कोई “व्याख्यान” थोड़े दिया जाता है) !

जैनों की सारी क्रियाएं “ज्ञान” प्राप्ति के लिए है.
भूल से ज्यादातर लोग “पुण्य” के लालच में फंसते हैं.
“फंसाने” वाले कौन है, वो लिखने की जरूरत नहीं है.

ये वही लोग हैं जो खुद बौद्ध धर्म की विपश्यना से प्रभावित हैं.
और जैन धर्म की योग – क्रिया को “पचा” तो क्या,
अभी तक “समझ” भी नहीं पाये.

क्या समय बदल गया है?

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ये कहा जाता है कि अब समय “बदल” गया है.
“समय” तो आज से नहीं,
“हर समय” बदलता है.
हर “क्षण” बदलता है.

हम बदलते हैं
हमारी “सोच” के कारण !

यदि “समय” के साथ सब कुछ बदलता,
तो हमारा “धर्म” भी बदल जाना चाहिए था.
हमारे “धर्म सूत्र” भी बदल जाने चाहिए थे.
हमारे “जप-तप-ध्यान” की विधि भी बदल जानी चाहिए थी.

परन्तु जैन धर्म की “विधि” तो नहीं बदली
हाँ, बहुत से जैन साधुओं ने “बौद्ध” धर्म की
“विपश्यना” को जरूर स्वीकार कर लिया है.
ये कहा जा सकता है कि “वो” बदल गए हैं.
“चातुर्मास” के “अलावा” शेष काल में
वो अलग अलग “ध्यान” शिविर अटेंड करते हुवे मिल जाते हैं.
जहाँ उनका “गुरु” एक “अजैन” होता है.

उस समय उनका “ओघा” भी एक किनारे “पड़ा” रहता है.

Shocking!

हमारे गुरुओं ने काउसग्ग पर कभी व्याख्यान देने की गम्भीर चेष्टा नहीं की.
इसीलिएध्यानऔर उससे सम्बंधित उपलब्धियों के मामले में 
बौद्धधर्म केलामाहमारे आचार्यों से बहुत आगे हैं.

कारण?

हमने “इधर-उधर” फांफे ज्यादा मारे हैं.
बड़े बड़े “प्रोजेक्ट्स” पर हम काम कर रहे हैं.
(इस पर काम भी काफी हुआ है).
परन्तु जैन धर्म की मूल ध्यानविधि पर हमने “ध्यान” नहीं दिया.

जो श्रावक “ध्यान” करना चाहते हैं
“गुरु” उन्हें “सरलता” से “उपलब्ध” नहीं हैं.
क्योंकि गुरु तो “मिनिस्टर्स” और “बड़े आदमियों” की
मीटिंग्स में “व्यस्त” रहते हैं.

नतीजा ?
आगे आगे देखो क्या होता है !

चेतावनी:
“जाग्रति” खुद से ही लानी होगी.
“दूसरे” का “भरोसा” नहीं किया जा सकता.
“दूसरे” को तो खुद की समस्यायों से ही निपटने का “ समय“ कहाँ है !

विशेष:
“ध्यान” की कोई भी “विधि” गलत नहीं होती.
परन्तु “अपने  धर्म की  “ध्यान” “विधि” छोड़कर “दूसरी विधि” को अपना लेना
– क्या इसे “अच्छा” कहा जाना चाहिए ?

वेधक प्रश्न:
क्या “जैन धर्म” में “ध्यान” की “विधियां” अधूरी हैं?

यदि हाँ, तो फिर प्रधानं सर्व धर्माणां ….”
कहने का उनकोअधिकार नहीं है
जो अन्य धर्म की “विधियों” को स्वीकार कर चुके हैं.

मन और वचन की महत्ता है शरीर की नहीं.

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“मन” और “वचन” की
जितनी “महत्ता” है
उतनी “काया” (शरीर) की नहीं.
यदि होती,
तो वेश्याएं “पूजी” जातीं.
(“खोपड़ी” हिला देने वाली बात है).
 
“सुन्दर पुरुष और स्त्रियां”
अपने “शरीर” का गर्व ना करें.
(गर्व करे तो अपने श्रेष्ठ जैन कुल पर करे).
 
शरीर की “सुंदरता” ने कइयों को भ्रष्ट किया है
– सूर्पनखा और रावण – दोनों भाई-बहिन इसके “शिकार” हुवे हैं.
 
यदि सूर्पनखा “भ्रष्ट” ना हुई होती,
तो रावण भी “भ्रष्ट” ना हुआ होता.
 
मतलब ये एक “चेन” है
जो कइयों को भ्रष्ट करती है.
 
जिस सुंदरता के कारण कोई “भ्रष्ट” होता हो,
उसकी क्या महत्ता है !
 
भगवान् महावीर के व्याख्यानों में भी
ऐसी बातों का वर्णन है.
 
और स्थूलिभद्र को कौन नहीं जानता !
 
सार :
मन और वचन को लगाम में लिए बिना
“शरीर” कोई “उत्कृष्ट” कार्य कर ही नहीं सकता !
 
प्रश्न :
हमारे “शरीर” की “सुंदरता” के कारण किसी के मन में विकार आता हो,
और इस कारण कोई भ्रष्ट होता हो, तो हमें कैसा लगना चाहिए?

प्रभु दर्शन

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सवेरे सवेरे प्रभु दर्शन क्यों करें?

जैसा हम रोज देखते हैं, वैसे ही विचार भी आते हैं.
रोज सवेरे सवेरे “चोर” और “डाकुओं” को कौन देखना चाहेगा?
(पूरे दिन में भी कोई देखना नहीं चाहेगा).

फिर भी हम रोज सवेरे सवेरे “न्यूज़ पेपर” पढ़ना चाहते हैं.
कइयों को तो “चाय” का मजा भी नहीं आता
जब तक चाय पीते के साथ में पेपर नहीं पढ़ रहे होते हैं.

 

न्यूज़पेपर के पहले ही पेज से हत्या, लूट, खसोट, बईमानी,
इत्यादि के समाचार बड़े अक्षरों में छपे मिलते हैं.

इसका हमारे मन पर बड़ी ख़राब प्रभाव पड़ता ही है.

जैन धर्म में इससे बचने के लिए बड़ी सरल विधि बताई है:

उठते ही सबसे पहले भगवान् के दर्शन करें.
उनके अनन्त गुणों की स्तुति करें.
“उनके जैसा” बनने की प्रार्थना करें.
जैन धर्म में व्यक्ति “भगवान्” बन जाये,
ऐसी व्यवस्था भी की गयी ही है.

परन्तु “भगवान्” बनने के लिए कोई “दर्शन” नहीं करने हैं.
पहले “शुद्ध” होने की प्रार्थना करनी है.

यदि हम “शुद्ध” हो गए,
तो समझो “भगवान्” जैसे बन ही गए !

परन्तु याद रहे, ये इतना सरल नहीं है.
“सम -भाव” में स्थित रहना
कोई “मजाक” नहीं है.

हे आदिनाथ !

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हे आदिनाथ !

त्वच्चिन्तनम् जनयते विमलप्रबोधं
त्वच्चिन्तनम् जनयते सकलप्रमोदं
त्वच्चिन्तनम् जनयते सकलार्थसिद्धिम्
त्वच्चिन्तनम् जनयते खलु मोक्षसिद्धिम्

आपका चिंतन करने से बुद्धि निर्मल हो जाती है.
आपका चिंतन करने से सब तरह से आनंद हो जाता है.
आपका चिंतन करने से मनोरथ सिद्ध हो जाता है.
आपका चिंतन करने से मोक्ष भी प्राप्त हो जाता है.

हे युगादिदेव श्री आदिनाथ !

इस “संसार” रुपी
“रण” में
तेरी ही
“शरण” है.

हे जगबंधु !

आपके जितने भी “सांसारिक सम्बन्धी” थे,
वो सभी “मोक्ष” गए.
मैं भी “संसारी” हूँ
और
मैंने भी आपसे “सम्बन्ध” बना लिया है.
इसलिए मेरा भी “मोक्ष” अब निश्चित है.

हे आदिनाथ !

मैं इस जन्म में आपके दर्शन कर पाया,
इससे अधिक मेरा और क्या अहोभाग्य हो सकता है !

एक “चरणोपासक”

फोटो : SKR
श्री आदिनाथ भगवान् जिनालय
घेटी पाग,
पलिताना

विशेष:-
एक लकवाग्रस्त कारीगर को
इस प्रतिमा जी को “घड़ने” के लिए कहा गया.
(“वही” प्रतिमा जी घड़ेगा, ऐसा पहले से निश्चित था
परन्तु प्रतिमा जी “घड़ने” के मुहूर्त्त से पहले उसे लकवा हो गया)

“आश्चर्य” तब घटित हुआ
कि पहली ही हथौड़ी मारते ही
उसके “हाथ” में तेज “झनझनाहट” हुई
और
लकवा ठीक हो गया.

भगवान् महावीर के श्रावकों द्वारा सहन किये गए उपसर्ग

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भगवान् महावीर के श्रावकों द्वारा सहन किये गए उपसर्ग

कामदेव श्रावक

इनके पास अठारह करोड़ सोना मोहर और साठ हज़ार गायें थीं.
इनकी आराधना की प्रशंसा देवलोक में भी हुई.
एक देव परीक्षा करने के लिए नंगी तलवार लेकर आया.
फिर विशाल हाथी और विषैले सर्प का रूप धारण करके “मारणान्तिक” कष्ट देने लगा.
फिर भी कामदेव अपने “ध्यान” से विचलित नहीं हुवे.
देव ने प्रकट होकर क्षमायाचना की.
जीवन के अंत में एक महीने का संथारा करके सौधर्म कल्प में “अरुणाभ” विमान में उत्पन्न हुवे.
वहां चार पल्योपम की आयु भोगकर महाविदेह क्षेत में जन्म लेकर मोक्ष पाएंगे.

इसी प्रकार चुलनीपिता,चुल्लशतक, सकडाल पुत्र, इत्यादि ने देव द्वारा किये गए उपसर्ग सहन किये.
कामदेव और आनंद श्रावक तो जरा भी विचलित नहीं हुवे.
चुलनीपिता और चुल्लशतक विचलित हुवे पर वे प्रायश्चित्त करके शुद्ध बने.
अंत में सभी आयुष्य पूरा करके सौधर्म देवलोक में उत्पन्न हुवे हैं
और वहां से महाविदेह क्षेत्र में जन्म लेकर मोक्ष पाएंगे.

सभी के जीवन में कुछ समानताएं हैं.
सभी अव्वल कोटि के धनाढ्य थे, बीस वर्ष तक धर्माराधना की,
श्रावक की ग्यारह प्रतिमाओं को धारण किया और अपना जीवन संवारा.
उनके जीवन से हमें प्रेरणा मिलती है –
धनाढ्य होते हुवे भी “मन” को “धर्म” में “स्थिर रखा.

और हम?
“धर्म” के नाम पर “लड़” पड़ते हैं !
काम “धेले” का नहीं करते हुवे भी
“धनाढ्य व्यक्ति” ट्रस्टी का पद छोड़ना नहीं चाहते.

हम भी श्रावक हैं
परन्तु देवों को हमारे ऊपर “उपसर्ग” करने की कोई आवश्यकता नहीं है
क्योंकि हम खुद अपने आप में “उपसर्ग” पैदा करने वाले “जीव” हैं.

मन्त्र-स्तोत्र की ताकत

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“सांसारिक कार्य” में लगे व्यक्ति को
“अधिक” मंत्र जप और स्तोत्र नहीं पढ़ने चाहिए.
उनकी “ताकत” को वो “झेल” नहीं सकेगा.

विशेष :
ब्रह्मचर्य के बिना तो मंत्र और स्तोत्र की “ताकत” को
“पचा” पाना” “सोच” से बाहर है.
(जिन्हें “अंदर” से “सांसारिक सुख” – इसमें “रोग से मुक्ति” भी शामिल है,
परन्तु बाहर से कहते हैं कि हमें कुछ नहीं चाहिए,
वो लोग तो “ज्यादा मंत्र और स्तोत्र” पढ़ने के बाद
बहुत जल्दी “बिमारी की चपेट” में आ जाते हैं.

-ऐसे cases में उनकी डॉक्टरी रिपोर्ट “NIL” आती है
फिर “किसी” को बुला कर पूछते हैं कि ऐसा क्यों है?
यदि उन्हें कहा जाए कि “अपना” जाप कम कर दो
तो वो इसे स्वीकार नहीं करते.

बहुत ज्यादा मंत्र-साधना करने वालों को
बहुत ज्यादा “अशक्त” भी देखा गया है.

निवारण:

रोज के बस तीन-चार या ज्यादा से ज्यादा पांच स्तोत्र पढ़े.
वो भी हर स्तोत्र दिन में सिर्फ एक बार.
नवकार की भी माला ज्यादा से ज्यादा रोज की दो ही फेरें.

“राज्य” और “अकाल” जैसी समस्या का निवारण जब “मंत्र” से हो जाता है,
वो “हमारी” समस्याएं तो उसके आगे क्या चीज हैं !

नोट :
जिन्हें “संसार” से मुक्ति चाहिए, वो “नवकार” का स्मरण हर समय कर सकते हैं.
पर फिर ये ना कहें कि दिन भर नवकार जपता हूँ फिर भी “धंधा” नहीं चलता.

“नवकार” तो “भव-मुक्ति” की और ले जा रहा है और आप वापस “बैक” मारना चाहते हो !

क्या कभी कभार पाप करने की छूट मिल सकती है?

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क्या “मौज-मस्ती” के लिए कभी कबार पाप करने की छूट मिल सकती है?
(Whether sin be allowed sometimes to commit)?

कुछ लोगों का कहना है कि
मैं तो बस कभी कभी “ड्रिंक” कर लेता हूँ.
मैं तो बस कभी कभी…..इत्यादि

अब कभी कबार “पाप” करने
और रोज पाप करने वाले में
फर्क को ढूंढ कर बताएं.

ये एक ही बात जो “उदाहरण” स्वरुप है,
आपको “पूरी” तरह “हिला” कर रख देगी.

मानो कि किसी की पत्नी आज “पहली” बार
किसी के साथ “भाग” गयी
और “दूसरे” दिन सवेरे ही आ गयी,
तो क्या आप कह सकेंगे
कि एक दिन में
ऐसी कौन सी बर्दाश्त ना करने वाली बात हो गयी !

ये बात तो आप फिर भी पढ़ सकेंगे.
यदि ऐसा ही “खुद” के बारे में सोचें
तो “आँखों” के “आगे” “अँधेरा” आ जाएगा.

“पाप” का सिर्फ एक बार “सेवन”
इतना “भयंकर” नतीजा देने वाला है.
तो जो रोज पाप करता है, उसके बारे में ……

(ये बात केशी श्रमण और प्रदेशी राजा के बीच में हुई है
– जैन धर्म के “कुछ” उदाहरण “पूरी” तरह “हिला” देने वाले होते हैं,
वरना इस काल में इतनी “दीक्षाएं” नहीं हो सकती थीं).

इसीलिए जैन धर्म का सच्ची तरह पालन करने वाला बहुत “चुस्त” होता है.

प्रश्न:
हम किस “केटेगरी” में आते हैं?

“जैन” मात्र एक “धर्म” नहीं, “ब्रांड” है.

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“जैन” मात्र एक “धर्म” नहीं,
“ब्रांड” है.

“जैन” होने का मतलब
“भाल” पर “तिलक” होना.
(Trademark जैसा)!

“जैन” होने का मतलब
“आलू-प्याज” ना खाने वाले.
(दूसरे भी यही मानते थे).

“जैन” होने का मतलब
“रात्रि-भोजन” ना करने वाले.
(एक जैन को रात्रि भोजन के लिए पूछने की हिम्मत ही नहीं करते थे).

और आज !

ज्यादातर होटल्स चलते ही “जैनों” के कारण हैं.
“पर्युषण” के दिनों में किसी भी होटल वाले को पूछ लो.
कहेगा कि अभी तो जैनों के त्यौहार है,
इसीलिए बहुत मंदी है.
(पर्युषण के तुरंत बाद सभी होटल्स “हाउसफुल” मिलेंगे
-जैनों के कारण).

सोचने की बात ये है कि भला मुट्ठी भर जैन
“होटल इंडस्ट्री” को कैसे “हिला” सकते हैं !

बात का सार:
अब “इस” ब्रांड में वो “बात” नहीं रही.
कुछ और ही “ब्रांड” उनके दिमाग में बस गयी है.

विशेष:
जब अंग्रेजों का राज्य था,
तब एक “तिलकधारी” जैन की गवाही का मतलब,
“सत्य” क्या है, उसकी और परीक्षा करने की जरूरत नहीं.

अगले भव का बीमा

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agle bhav ka bima jainmantras

अगले भव का बीमा

“वर्षों के बाद” आज आपका “सपना” पूरा हुआ है.

काफी वर्षों के बाद…
पैसा बचाने के बाद….
आप “Sedan Car” लेते हो.
एक हफ्ते के बाद ही हाईवे पर
आप अपनी कार को 130 की स्पीड
पर चला कर “मजा” ले रहे हो.

और अचानक !
वो “घटित” होता है जो किसी ने तो क्या,
आपने अपने बारे में कभी नहीं सोचा था.

बस मनुष्य भव को भी वैसा ही समझ लें.
अनगिनत भवों के बाद
(काफी कोशिश से नहीं, पूर्व जन्म के पुण्य के कारण; और वो पुण्य क्या था, हमें नहीं पता)
“ये” जन्म मिला है.

मनुष्य भव का “मजा” लेते लेते कब क्या हो जाएगा,
क्या पता !
अचानक से ही तो सब घटित होता है.
“कार” का तो “बीमा” होता है,
“अगले भव” का “बीमा” कौन करेगा?”
उत्तर है:
अगले भव का बीमा करेगा : “नवकार !”
(“कार” की “चमक” तो इसके आगे कुछ भी नहीं है).

बात मेरी आत्मा से

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talk with my soul jainmantras
talk with my soul on jainmantras

“अपने आप” को ही “मैं”
अभी तक “समझ” नहीं पाया हूँ.”
– ये विचार तब तक रहता है
जब तक “मैं”
“अपने-आप” को
“देख” ना लूं
“आत्मा” को “देखने” की बात है,
“समझने” की नहीं.

“आत्मा” (soul) की बात तो
आजकल मंच पर बैठकर वो “लोग” भी कर लेते हैं
जिनका “आत्मा” से कुछ “लेना-देना” नहीं है.
(“आत्मा” का वास्तव में
किसी से लेना-देना नहीं है,
वो अच्छी तरह समझ चुके हैं). 🙂

एक नंबर का
“स्वार्थी” ही बनना है तो
“अपने आप” से
“प्रेम” करना सीख लो.

अपनी “साधना” को
वैसे ही “गुप्त” रखें,
जैसे की “धन” को.
विडम्बना ये है कि
आजकल इन दोनों की
ही “शोबाज़ी” सभी करते हैं.

“आत्मा” (soul) “गुप्त” रहती है.
उसे “प्रकट” करने के लिए ही
“आत्म-साधना” (meditation) करनी होती है.
“खुद” की ही “आत्मा”
और
“खुद” से ही “गुप्त” !
कैसा सिस्टम है !

उच्च विचार जिस दिन आने लगें,
समझें – अब उन्नति निश्चित है.

“धर्म” की “पाठशाला” (school of religion) में
हर कोई “पास” भी नहीं होता
और “फ़ैल” भी नहीं होता.

“आत्मा” का “एक्सीडेंट” (accident of “soul)”
“मोक्ष मार्ग” (parth for moksh) को
यदि हमने इस जन्म में नहीं समझा
तो समझ लेना कि
एक तो हम Wrong Side में गाडी चला रहे हैं
और
दूसरा हमने Turn भी गलत दिशा में ले लिया है.
(“आत्मा” का “एक्सीडेंट”
करने की “व्यवस्था” हमने स्वयं कर ली है).

“मुक्ति” का मार्ग
चुनने वाले
अक्सर “बंधन” का
मार्ग चुन लेते हैं.

अपनी “मान्यताओं” (assumptions) में “बंध” जाते हैं.
जानने के लिए बहुत कुछ होता है
पर अपनी “मान्यताओं” से ही
“बाहर” नहीं निकल पाते.

High Voltage Shock:
“जीवन” के “अंतिम” समय में
“यदि” पता पड़े कि
जिन्हें हम मौलिक मान्यताएं समझ बैठे थे
वो तो “किसी” की बनाई हुई थी,
वास्तव में “थी” नहीं,
तो “जीव” की गति कैसी होगी?

“मति-ज्ञान” और “श्रुत-ज्ञान”

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mati gyan and shrut gyan jainmantras

“मति-ज्ञान” के बिना “श्रुत-ज्ञान” “अधूरा” है
और
“श्रुत ज्ञान” के बिना “मति-ज्ञान” “अधूरा” है.

वर्तमान में ये दो ज्ञान – मति ज्ञान और श्रुत ज्ञान,
अभी भी सम्पूर्ण रूप से विद्यमान हैं.
भगवान् की वाणी है – “श्रुत-ज्ञान” !
सम्पूर्ण रूप से “शुद्ध” !

हमारी “मति” उसे ग्रहण कर सकती है,
यदि “मन” हो “शुद्ध” !
बस उसके लिए “अत्यन्त चाह” हमें ही
उत्पन्न करनी होगी.

कई साधू “श्रुत-ज्ञान” में
अपना पूरा जीवन “झोंक” देते हैं.
फिर भी “विशाल जैन साहित्य” में मात्र एक “डुबकी” लगा पाते हैं.
और तो और,
अरिहंत की कृपा से उन पर “विशिष्ट विवेचन” भी कर पाते हैं.

आश्चर्य तो इस बात का है कि
फिर भी ये नहीं कह पाएंगे कि
“भगवान्” ने “शत-प्रतिशत” ऐसा ही कहा है.

कारण?
जैन धर्म के सूत्र “अत्यन्त गूढ़” हैं.
एक-एक सूत्र पर लाखों व्याख्यान हो सकते हैं.
पर “अंत” में वो “नवकार”
पर ही आकर “स्थित” हो जाएंगे.

ऐसा क्यों?
पहला प्रश्न है – क्या “लाखों” व्याख्यान सुनाने की तैयारी है?
याद रहे : समझना भी पड़ेगा, समझ ना आये तो कोशिश भी करनी होगी.
फिर भी ना समझ आये, तो “साधना” भी करनी होगी.
“साधना” में “वर्षों” तक “जुटे” रहना पड़ेगा
“धैर्य” की भी “विकट-परीक्षा” होगी.
अंत में सब कुछ “आत्मा” पर ही “स्थित” होना होगा,
सम्पूर्ण जैन धर्म का यही सार है:

“आत्म-तत्त्व” को प्राप्त कर लेना.

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