“जैन” मात्र एक “धर्म” नहीं, “ब्रांड” है.

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“जैन” मात्र एक “धर्म” नहीं,
“ब्रांड” है.

“जैन” होने का मतलब
“भाल” पर “तिलक” होना.
(Trademark जैसा)!

“जैन” होने का मतलब
“आलू-प्याज” ना खाने वाले.
(दूसरे भी यही मानते थे).

“जैन” होने का मतलब
“रात्रि-भोजन” ना करने वाले.
(एक जैन को रात्रि भोजन के लिए पूछने की हिम्मत ही नहीं करते थे).

और आज !

ज्यादातर होटल्स चलते ही “जैनों” के कारण हैं.
“पर्युषण” के दिनों में किसी भी होटल वाले को पूछ लो.
कहेगा कि अभी तो जैनों के त्यौहार है,
इसीलिए बहुत मंदी है.
(पर्युषण के तुरंत बाद सभी होटल्स “हाउसफुल” मिलेंगे
-जैनों के कारण).

सोचने की बात ये है कि भला मुट्ठी भर जैन
“होटल इंडस्ट्री” को कैसे “हिला” सकते हैं !

बात का सार:
अब “इस” ब्रांड में वो “बात” नहीं रही.
कुछ और ही “ब्रांड” उनके दिमाग में बस गयी है.

विशेष:
जब अंग्रेजों का राज्य था,
तब एक “तिलकधारी” जैन की गवाही का मतलब,
“सत्य” क्या है, उसकी और परीक्षा करने की जरूरत नहीं.